कवयित्री नीता पोरवाल ने सुनाया-बहुत हुई दुनिया की रस्म और रंजो-गम की बातें आज हो सके तो कहो इससे अलाहिदा कुछ कहो, धुंध में लिपटे ये सुबहो-शाम ये जमीं ये दरख्त ऐसे में जीने की वजह ढूंढते फड़फड़ाते परिंदों के बारे में कुछ कहो। कवयित्री आरती मित्तल ने सुनाया- भारत मां को जब हम फूलों से सजाते हैं, तिरंगा आसमानों पर लहर-लहर लहराते हैं, देश के वीरों की गाथा, फख्र से हम सुनाते हैं, बड़े-बड़े आयोजन कर आजादी का जश्न मनाते है, क्या यह है वो आजादी जिस पर हम इतराते हैं।
कवयित्री नीरा माहेश्वरी ने सुनाया- सरहद पर तैनात प्रहरी वीर जवान से ही हम चैन की नींद सोते रहे, धरती मां का आंचल मैला न हो लाडले खून की होली खेलते रहे, मां भारती का यश गौरव ऊंचा रहे लाल जान की बाजी लगाते रहे, शान से कुर्बान जब तिरंगे में लिपटकर जाबांज लाए जाते रहे। कवयित्री वर्षा अग्रवाल ने पढ़ा-करूं नमन में मैं करूं नमन उस लहू को जो दौड़ता है रगो में जनक बन, फड़कता है भुजाओं में आक्रोश बन, देश की आन के लिए प्रतिबद्ध शत्रु से लेने प्रतिशोध हो जाता है न्यौछावर, मन-वचन कर्म से।
एएमयू के हिंदी विभाग के शोधार्थी आशीष कुमार तिवारी ने पढ़ा- बच्चो, जब जमीन पर इमारतें उतर आएं, तो उन इमारतों के सिर पर, एक गमला मिट्टी भरकर रख देना, ताकि उन्हें एहसास रहे, मिट्टी ही सत्य है, मिट्टी ही शाश्वत है। एएमयू के हिंदी विभाग के शोधार्थी अरुण रंजन कवि ने पढ़ा-अगर बारिश की धार को काट सकते तो, हंसुआ से उन्हें चीर डालता, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता था, अब क्या होगा? अब तो गेंहू, चना, मटर, सरसों सब बर्बाद हो जाएगा, और हम भी।