कारगिल विजय दिवस के 22 साल हो गए। आज के ही दिन देश के वीर सपूतों ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को धूल चटाकर भारत का तिरंगा लहराया था। इस युद्ध को जीतने में अलीगढ़ के तीन वीर सपूतों का अतुलनीय योगदान रहा। उन वीरों ने रणभूमि में अपने प्राण न्यौछावर कर देश की रक्षा की और अलीगढ़ की धरा को धन्य कर दिया था। इस मिट्टी के जर्रे-जर्रे में अपनी वीरता का लहू भर दिया और अमर हो गए। शहादत के बाद परिवार वालों से तमाम सरकारी दावे किए गए थे। परिजनों को लगा था कि इस मरहम से उनका दर्द कुछ हलका होगा। मगर, प्रशासनिक हीलाहवाली और उपेक्षा की वजह से परिजनों से किया गया जमीन और शहीद मार्ग बनाने जैसे वादे अब तक अधूरे हैं। यहां तक कि दबंगों ने परिवार को दी गई जमीन पर भी कब्जा कर लिया है। इसकी सुनवाई तक नहीं हो रही है। हालांकि, शहीदों के परिजनों आज भी उन वादों को हकीकत में बदलने की आस लगाए हुए हैं।
परिवार को मिली जमीन पर कब्जा
इगलास के गोरई के गांव वास खेमा निवासी प्रेमपाल सिंह महज 19 साल की उम्र में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। नौकरी के छह माह भी बमुश्किल पूरे हुए थे। पिता शिव सिंह और मां वीरमती देवी ने बताया कि 1999 में प्रेमपाल की शादी की बात चल रही थी। परिवार के लोगों में खुशी थी कि बहू घर आएगी। मगर, जुलाई में बेटे के शहीद होने की सूचना आ गई। इसके बाद दो साल तक मां ने अन्न का तिनका मुंह में नहीं रखा। आज भी वह प्रेमपाल की प्रतिमा को प्रतिदिन भोजन कराती हैं। वीरमती के मुताबिक उनको गैस एजेंसी मिली थी। कुछ पैसा भी मिलने की बात आई। मगर, वह मिला या नहीं, यह नहीं पता। सरकार ने गांव में जमीन दी थी। अब उस जमीन पर कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया है। प्रशासन के चक्कर काटते-काटते परेशान हैं। इधर, बिजली विभाग कई बार बढ़ा हुआ बिल भेज देता है। वह कहती हैं कि जिस बेटे ने देश के नाम रोशन किया, क्या बिजली विभाग उनके घर को रोशन नहीं कर सकता।
जमीन देने का वादा अधूरा
गोंडा के गांव छोटी बल्लभ की मिट्टी में जन्मे नरेश सिंह 28 फरवरी 1992 में सेना में भर्ती हुए थे। वह सौरभ कालिया के साथ सबसे पहले कारगिल की चोटी पर पहुंचने वालों में से एक थे। 8 जून 1999 को कारगिल में वह शहीद हो गए थे। नरेश के पिता राजेंद्र सिंह व मां रूपवती देवी आज भी मानती हैं कि उनका बेटा सीमा पर देश की रक्षा कर रहा है। परिवार को बेटे की शहादत पर गर्व है। 28 अप्रैल 1996 में अतरौली के महका निवासी कल्पना देवी से उनका विवाह हुआ था। उनके बच्चे नहीं थे। कल्पना देवी बताती हैं कि पति की शहादत के बाद उनको मदद के तौर पर पेट्रोल पंप मिला। गांव के एक मार्ग का नाम उनके नाम पर भी रखा गया। उस वक्त सरकारी अधिकारियों ने कहा था कि उनको 20 बीघा जमीन दी जाएगी। मगर, यह वादा आज भी अधूरा है। उन्होंने कहा कि अगर यह जमीन मिल जाए तो पति के नाम पर पार्क बनाएंगी। साथ ही युवाओं को फौज में जाने के लिए तैयारी के लिए इस जमीन को उपलब्ध कराएंगी।
अस्पताल व स्कूल की मांग अधूरी
अतरौली के गांव राजगांव के राजवीर सिंह सेना में सूबेदार थे। पत्नी रामवती देवी को अपने पति की शहादत पर गर्व है। वह बताती हैं कि उनके दो बेटे दिनेश और लोकेश हैं। दोनों की परवरिश के लिए सरकार ने पेट्रोल पंप दिया था। गांव में शहीद स्थल बना दिया। इसी वक्त शहीद पति के नाम पर गांव के मार्ग का नाम परिवर्तित करने, गांव में पति के नाम सरकारी अस्पताल और कन्या इंटर कालेज खोलने की मांग की गई थी, जिससे की भावी पीढ़ी उनके पति को याद रखे। मगर, सरकार ने इस मांग को आज तक पूरा नहीं किया है। अब तो मांग पूरी होने की आस खो दी है। रामवती बताती हैं कि कारगिल में राजवीर युद्ध के समय दुश्मनों से लोहा ले रहे थे। तभी उनका एक साथी गोलियों की बौछार से घिर गया। राजवीर सिंह ने साहस का परिचय देते हुए अपने साथी की जान बचाने के लिए दौड़ पड़े, तभी दुश्मनों की गोली से वह शहीद हुए थे।
शहीद नरेश सिंह का फाइल फोटो- फोटो : CITY OFFICE
शहीद प्रेमपाल सिंह का फाइल फोटो- फोटो : CITY OFFICE