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Aligarh News: यहां के साहित्यकारों को अलीगढ़ कुनबा बुलाते थे कमलेश्वर, जब भी अलीगढ़ आए साहित्यिक हलचल पैदा की

Fri, 06 Jan 2023 04:10 PM IST
चमन शर्मा इकराम वारिस

सार

कमलेश्वर अलीगढ़ के साहित्यकारों को अलीगढ़ कुनबा कहकर पुकारते और लिखते भी थे। उनका अलीगढ़ से आत्मीय रिश्ता था। उनकी पद्मश्री काजी अब्दुल सत्तार, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित शहरयार और एएमयू के हिंदी प्रोफेसर केपी सिंह गहरी मित्रता थी।
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कमलेश्वर साहित्यकार - फोटो : साेशल मीडिया
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विस्तार
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मशहूर साहित्यकार कमलेश्वर अलीगढ़ के साहित्यकारों को अलीगढ़ कुनबा कहकर पुकारते और लिखते भी थे। उनका अलीगढ़ से आत्मीय रिश्ता था। उनकी पद्मश्री काजी अब्दुल सत्तार, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित शहरयार और एएमयू के हिंदी प्रोफेसर केपी सिंह गहरी मित्रता थी। जब भी वह अलीगढ़ आते थे, तो अपने मित्रों से जरूर मिलते थे। शहर में वह नई साहित्यिक हलचल छोड़ जाते। वह डॉ. नमिता और प्रो. केपी सिंह के आवास भी भोजन करते थे। अलीगढ़ में अपने जीवनकाल में अलग-अलग कार्यक्रमों में तकरीबन 20 बार आ चुके थे। 

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मशहूर साहित्यकार कमलेश्वर की जयंती पर एएमयू के हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर अजय बिसारिया कहते हैं कि उनके साथ कई बार समय गुजारने का मौका मिला है। उनके अनुरोध पर उनके भांजे की पहली बरसी पर उनकी लिखी पुस्तक का विमोचन करने वह भरतपुर भी आए थे। अजय ने कहा कि वह बहुत जिंदादिल इंसान थे। उनके पढ़ने का अनुशासन था। सिगरेट से उनकी गहरी यारी थी। वर्ष 2003 में आखिरी बार कमलेश्वर अलीगढ़ आए थे। उसके बाद उनसे मोबाइल पर ही संपर्क रहा। उन्होंने ‘विरासत के अलंबरदार कमलेश्वर’ शीर्षक पर पुस्तक का संपादन भी किया था।

कमलेश्वर की साहित्यिक प्रतिबद्धता अद्वितीय थी
समकालीन हिंदी कथा साहित्य के एक सशक्त हस्ताक्षर बहुमुखी प्रतिभा संपन्न रचनाकार कमलेश्वर एक साथ कहानीकार, उपन्यासकार, संपादक, अनुवादक, पटकथा लेखक आदि के रूप में बहुत समादृत साहित्यकार कहे जा सकते हैं। साहित्य अकादमी सहित अनेक अकादमिक  कार्यक्रमों में उनको अनेक बार सुनने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ है। वाणी प्रकाशन द्वारा सन् 2006 में  प्रकाशित एवं दीक्षित दनकौरी द्वारा संपादित ‘गजल दुष्यंत के बाद’ की प्रकाशन शृंखला में भाग-एक और भाग-दो, जिसमें एक रचनाकार के रूप में मुझे भी सम्मिलित होने का अवसर मिला था।
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प्रगति मैदान में उसके लोकार्पण पर आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कमलेश्वर को ‘हिंदी में गजल और उसके वैशिष्ट्य एवं विस्तार’ विषय पर सुनना बहुत रोचक था। हालांकि, उस समय वे रुग्ण और अस्वस्थ लग रहे थे, लेकिन तब भी उनकी साहित्यिक प्रतिबद्धता अद्भुत और अद्वितीय थी। ऐसे रचनाकार को स्मरण करना सुखद है। -प्रो. शंभूनाथ, हिंदी विभाग एएमयू

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‘कितने पाकिस्तान’ पर संगोष्ठी में पूरा एएमयू उमड़ पड़ा था

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कितने पाकिस्तान विशिष्ट शैली में लिखा बहुचर्चित उपन्यास है। इस उपन्यास को लेकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में एक संगोष्ठी रखी गई थी। वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम कुमार बताते हैं कि संगोष्ठी में अलीगढ़ का पूरा बौद्धिक समाज उमड़ आया था। कमलेश्वर के साथ ही उनके उपन्यास के प्रति भी लोगों का खासा आकर्षण था। 

काजी अब्दुल सत्तार, वेद प्रकाश अमिताभ, प्रेम कुमार, केपी सिंह, नमिता सिंह, सुरेश कुमार, राहत अबरार, शाफे किदवई, मेहताब हैदर नकवी, शिराज अजमली, तारिक छतारी, काजी अफजाल, अगारमी दुख्त सफवी जैसे साहित्यक दिग्गज मौजूद थे। कमलेश्वर का व्याख्यान जादुई था। आज भी लोग उसे याद करते हैं।   

कमलेश्वर के साथ मैं भी हो गया गिरफ्तार : प्रो. प्रेम कुमार
साहित्यकार डॉ. प्रेम कुमार ने साहित्यकार कमलेश्वर के बारे में कहते हैं ‘भीषण ठंड और घने कोहरे में तय समय से पहले पहुंचने के बावजूद कमलेश्वर जी ने जरा भी प्रतीक्षा नहीं कराई। डनहिल के पैकेट से सिगरेट निकालते हुए वे अतिथि कक्ष में मेरे सामने आकर बैठ गए थे। केन का सोफा दीवान, मेज, गद्दे, पर्दे, एकाधिक ऐशट्रे, गमले, पौधे, फूल, ढेर सारे प्रतीक प्रशस्ति पत्र, सब अपनी सुरुचि सम्पन्नता और कलात्मकता की बातें बताने को उत्सुक से थे। 

कमलेश्वर जी की चाल-ढालए बातचीत में चुस्ती-फुर्ती उनके उल्लास, उत्साह आदि ने उस समय अलग से ध्यान आकर्षित किया था। सबसे पहले मैंने कमलेश्वर जी से उस क्षण या घटना विशेष के बारे में जानना चाहा था, जिसने उन्हें लेखन के रास्ते की ओर मोड़ा। सुदूर अतीत की दूरी को पारकर वे तुरंत उस कालखंड में पहुंच गए थे, देखिए, बचपन में में समाजवादी क्रांतिकारी पार्टी से जुड़ गया था। पार्टी का आदेश हमारे लिए अंतिम होता था किसान आंदोलन चल रहा था तब योगेश चटर्जी दिल्ली में थे। केशव प्रसाद कहीं और गए हुए थे। हम कुछ लोग ऑफिस में बैठे हुए थे। 

पुलिस आई और हमें गिरफ्तार कर लिया गया। थोड़ा भय का क्षण भी था वह। नैनी जेल की खपरैल की कोठरी में 19 दिन बंद रहे। खेतों की निराई का काम मिला वहां। घास की जगह अन्न उखाड़कर हम अपना आक्रोश व्यक्त करते। 19वें दिन जेलर राउंड पर आया। हमें देखा स्टाफ  से पूछा कि इन नाबालिग लड़कों को क्यों पकड़ा, पकड़ा भी तो अब तक कोर्ट में पेश क्यों नहीं किए गए। उसने कहा कि इन्हें तुरंत छोड़ दो या फंस जाओगे। हमें निकलने के लिए मनाया गया। तब हमें बीड़ी का चस्का चुका था। लाल मोहम्मद बीड़ी बड़ी ‘फेमस’ थी तब एक बडल पंप और रिक्शे से लौटने के लिए छह आने पैसे लेकर हम बाहर आए। पैसा बचाने की गर्ज से पैदल चल पड़े’।
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