फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Kalyan Singh: भाजपा के पिछड़े नेता से हिंदुत्व के नायक बने कल्याण, यह इच्छा रह गई अधूरी

Thu, 21 Aug 2025 10:29 AM IST
चमन शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़

सार

कल्याण सिंह संसाधनों के अभाव के चलते बाइकों व साइकिलों से अलीगढ़ आना-जाना करते थे। जिला मुख्यालय पर आगरा रोड मदार गेट स्थित शंकर धर्मशाला जो अब जर्जर भवन में तब्दील हो चुकी है, वहां जनसंघ का कार्यालय हुआ करता था। वे राजनीतिक ककहरा सीखने मढ़ौली से वहीं आया करते थे।
विज्ञापन
कल्याण सिंह - फोटो : फाइल फोटो
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

बाबूजी से लेकर हिंदू हृदय सम्राट व हिंदुत्व-राम मंदिर आंदोलन के नायक तक के खिताब से नवाजे गए स्वर्गीय कल्याण सिंह की पुण्यतिथि पर आज बृहस्पतिवार को हिंदू गौरव दिवस मनाया जा रहा है। संघ-जनसंघ से जुड़कर सियासत करने वाले कल्याण सिंह के सियासी-सामाजिक जीवन के अनगिनत ऐसे किस्से हैं, जिससे उनके कद और पिछड़े नेता से लेकर हिंदुत्व के नायक तक के सफर का खुद अंदाजा लगाया जा सकता है।

विज्ञापन


अक्खड़ राजनेता-कठोर प्रशासक के रूप में पहचान रखने वाले कल्याण सिंह ने जिस राम मंदिर के लिए मुख्यमंत्री तक की कुर्सी त्यागी अंत समय में उसी राम मंदिर में पूजन-दर्शन तक की अधूरी इच्छा के साथ वे अंतिम यात्रा पर चले गए। किसान परिवार में जन्मे कल्याण सिंह बाल्यावस्था से ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ गए थे। जब वे छात्र जीवन में सामाजिक रूप से सक्रिय हुए तो जनसंघ से जुड़कर राजनीति करने लगे। लोगों के सुख दुख में शामिल होने के साथ-साथ लोगों को शाखाओं में शामिल कराने लगे। हालांकि ये कांग्रेस का युग था। जनसंघ से जुड़कर सियासत करना बेहद कठिन था।

संसाधनों के अभाव के चलते बाइकों व साइकिलों से अलीगढ़ आना-जाना करते थे। जिला मुख्यालय पर आगरा रोड मदार गेट स्थित शंकर धर्मशाला जो अब जर्जर भवन में तब्दील हो चुकी है, वहां जनसंघ का कार्यालय हुआ करता था। वे राजनीतिक ककहरा सीखने मढ़ौली से वहीं आया करते थे। वहीं बैठकों में पार्टी को आगे बढ़ाने की रणनीति बना करती थी। इसी क्रम में वे सबसे पहले चुनाव हार गए। प्रयास और मेहनत के दम पर दूसरा चुनाव जीते। उसी दौर में उनके साथियों में ठाकुर इंद्रपाल सिंह, केके नवमान, डॉ. राम सिंह, नेम सिंह चौहान आदि विधायक बने। ये वो दौर था, जब जनसंघ ने प्रदेश में 50 सीटें जीती थीं। उन्हें भाजपा संस्थापक सदस्यों में शामिल रखा गया। भाजपा के गठन के बाद पहले चुनाव में प्रदेश में भाजपा 11 सीटें जीती। कल्याण सिंह ने इसी 11 सीट वाली भाजपा को 221 सीटों के सहारे प्रदेश की सत्ता तक पहुंचाया।

विज्ञापन
विज्ञापन

साथी देते थे संसाधन, दिया दस बूथ का नारा

अतरौली के उनके साथी बाइक व जीप सहयोग में दिलाते थे। कभी कभार चंदे की साइकिल से भी वे जनसंपर्क पर निकल पड़ते थे। वे अपने संपर्क में गांव खुशहाल तो देश खुशहाल। मेरा बूथ दस यूथ.. इस नारे के सहारे वे पार्टी को आगे बढ़ाने का काम करते थे। पार्टी के प्रति उनकी मेहनत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बैठकों या रैलियों में वे उस समय साधन न होने से साइकिल तक से जाते थे।

दोस्तों को हमेशा रखा याद
उनके समय के केएमवी के शिक्षक रहे डीएस लोधी बताते हैं कि कल्याण सिंह अपने दोस्तों को हमेशा याद रखते थे। उन्होंने अपने साथ के बचपन के मित्र पिलखुनी के नवल सिंह वर्मा और नौअरी के राम सिंह को हमेशा याद रखा। राम सिंह को गैर राजनीतिक होते हुए भी ब्लॉक प्रमुख बनवाया। नवल सिंह के बीमार होने की खबर पर खुद दिल्ली से आकर उनसे मिलने पहुंचे और देखकर रोए।

डीएस लोधी कहते हैं कि मुझे उन्होंने खुद एक चिट्ठी भेजी और समय से घर पहुंचने की हिदायत दी। 1980 में मढ़ौली आकर रुके अटल विहारी वाजपेयी के सामने मुझसे कविता पाठ कराया। मेहनती व जीवट कल्याण सिंह बहन बेटियों के सम्मान, अपनों के आयोजन, क्षेत्र के परंपरागत आयोजन आदि को बेहद तवज्जो देते थे। वहां अवश्य पहुंचते थे।

संघर्ष भरे जीवन में रामलला के दर्शन की इच्छा रही अधूरी
जिस कल्याण सिंह का जीवन हिंदुत्व व राम मंदिर के लिए संघर्ष भरा रहा। उन्होंने विवादित ढांचा गिराए जाने के समय कारसेवकों पर गोली चलवाने के बजाय अपने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया। दो बार भाजपा से नाराजगियों के चलते दूरी बनाई। उनकी भव्य मंदिर में रामलला के दर्शन की इच्छा अधूरी रह गई।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें