यूनाईटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी की स्थानीय इकाई को मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्युनल (मोटर दुर्घटना प्रतिकर न्यायाधिकरण) के आदेश ही अवहेलना भारी पड़ गई। न्यायाधिकरण ने प्रकरण में कंपनी के खिलाफ रिकवरी आदेश जारी कर दिया, जिस पर तहसील प्रशासन ने कंपनी का स्थानीय बैंक खाता कुर्क करते हुए उसमें से करीब 20 लाख रुपये की वसूली की औपचारिकता पूरी की है। हालांकि, बैंक खाता कुर्क होने के बाद कंपनी की ओर से कुर्की आदेश वापस लेने व सीधे क्लेम भुगतान ग्रहण करने संबंधी अर्जी भी दी गई, जिसे न्यायाधिकरण ने तहसील प्रशासन की दलील पर खारिज कर दिया।
यह है प्रकरण
वाकया वर्ष 1998 से जुड़े मोटर दुर्घटना क्लेम का है। इस मामले में याची नूर शबा निवासी देहली गेट की याचिका पर स्थानीय न्यायालय ने 24 जुलाई 2000 को 5 लाख 462 रुपया एवार्ड (प्रतिकर देना तय) घोषित कर दिया था। इसके बाद याची ने अपना प्रतिकर बढ़ाने संबंधी अपील हाईकोर्ट में दायर कर दी, जिसे हाईकोर्ट ने स्वीकारते हुए 14 अक्तूबर 2019 को इंश्योरेंस कंपनी को प्रतिकर बढ़ाकर 15 लाख 52 हजार 843 रुपये पीड़ित के हक में भुगतान करने के आदेश दिए। इस आदेश पर स्थानीय स्तर से 23 जनवरी व 2 मार्च 2020 को दो अलग-अलग नोटिस इंश्योरेंस कंपनी को दिए गए। मगर, कंपनी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई और न अदालत में हाजिर हुए।
न्यायाधिकरण ने लिया प्रकरण का संज्ञान
न्यायाधिकरण के न्यायाधीश संजय सिंह के समक्ष जब यह प्रकरण आया तो उन्होंने 8 अक्तूबर 2020 को इंश्योरेंस कंपनी के खिलाफ रिकवरी आदेश तहसील कोल को जारी कर दिए। इसमें 15 लाख 52 हजार 843 रुपये पर साढ़े सात प्रतिशत ब्याज सहित वसूली का आदेश हुआ। इस पर एसडीएम कोल के निर्देश पर अमीन ने 2 नवंबर को कंपनी को अपनी तरफ से रिकवरी नोटिस जारी किया तो उस पर भी कंपनी की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया। इस पर अमीन ने इंश्योरेंस कंपनी का एचडीएफसी बैंक खाता 25 नवंबर को कुर्क करा दिया। साथ ही उसमें से प्रतिकर ब्याज सहित कुल 19 लाख 92 हजार 221 रुपये व संग्रह शुल्क 99 हजार 626 रुपये वसूली के लिए तहसीलदार कोल के नाम जारी करने का आदेश जारी कर दिया। इसकी औपचारिकता बृहस्पतिवार को पूरी की गई है।
इधर, जैसे ही खाता कुर्क हुआ तो कंपनी की ओर से न्यायाधिकरण में याचिका दायर की गई और कुर्की आदेश वापस लेने व कंपनी की ओर से मुआवजा जमा करने की अपील की गई। मगर संग्रह अमीन ने न्यायाधिकरण में यह दलील दी कि कंपनी अब न्यायालय व तहसील की कार्रवाई से बचने के लिए यह प्रयास कर रही है। इस पर हमें आपत्ति है। न्यायाधिकरण ने इस दलील पर कंपनी की याचिका खारिज कर दी है।