इगलास के कस्बा बेसवां में धरणीधर सरोवर अपने सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व धार्मिक इतिहास को संजोए हुए है। विश्वामित्र की नगरी के रूप में प्रसिद्ध इस सरोवर के विषय में धार्मिक ग्रन्थों में मिलता है कि त्रेतायुग में ऋषि विश्वामित्र ने बेसवां में जन कल्याण के लिए यज्ञ किया था। तब ताड़का सहित अन्य राक्षस व्यवधान डालते थे। इसके चलते विश्वामित्र अयोध्या से भगवान श्रीराम व लक्ष्मण को अपने साथ यहां लाए, जिन्होंने ताड़का नामक राक्षसी का वध किया था। इसके बाद यज्ञ सफल हुआ। बाद में यज्ञ कुंड ही धरणीधर सरोवर हो गया। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने यहां गाय चराईं। यहां से जुड़ी गोचारण लीला का वर्णन पुराणों में भी है। यहां देश के विभिन्न हिस्सों से लोग दर्शन करने के लिए आते हैं। यहां कई मंदिर हैं। ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा का यह हिस्सा है।
बिजौली के पातालेश्वर महादेव
छर्रा के कस्बा बिजौली में द्वापर युग में धुंध ऋषि की तपो भूमि रही है। कहा जाता है कि ऋषि की तपो भूमि पर एक बार सभी देवता एकत्रित होकर गंगा स्नान के लिए गए थे, वापिस आकर सभी देवताओं ने कहा कि इस ऋषि की तपो भूमि पर कौन रुकेगा, जब सबने इन्कार कर दिया तब भोलेनाथ वहां विराज मान हो गए। जो आज पातालेश्वर बाबा के नाम से प्रसिद्ध है। ग्रामीणों का की कहना है कि शिवलिंग का कोई धरातल न मिलने के कारण ही मंदिर का नाम पातालेश्वर महादेव के नाम से रखा गया। लगभग दो एकड में फैले मंदिर प्रांगण में पातालेश्वर मंदिर के अलावा छोटे-छोटे 13 मंदिर और हैं। किवदंती के अनुसार धुंध ऋषि की तपो भूमि जब एक टीले के रूप में परिवर्तित हो गई थी। जब मजदूरों द्वारा उस टीले की खोदाई की जा रही थी कि अचानक एक मजदूर का फावड़ा किसी चीज से टकराने पर काम रोक दिया और देखा कि उस स्थान पर दूध बहने लगा। मिट्टी हटाने पर शिवलिंग के दर्शन हुए। उस शिवलिंग का लगभग 50 फुट तक खोदाई करने पर भी छोर नहीं मिलने पर वहीं मंदिर का निर्माण कराया गया।
धार्मिक-साहित्यिक नगरी हरदुआगंज
हरदुआगंज कस्बा पौराणिक महत्व के साथ साथ हिंदी साहित्य के क्षेत्र में भी अपनी एक पहचान रखता है। अधिकांश लोग हरदुआगंज को बलदाऊ की नगरी के नाम से भी जानते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार द्वापर युग के अंत में बलदाऊ गंगा स्नान के लिए जब रामघाट जा रहे थे तो खेरेश्वरधाम पर उन्होंने दैत्य सम्राट कोलासुर का अपने हल से वध किया। उसके बाद जहां उन्होंने कोलासुर के रक्त से सने अपने हल को धोया था, उस स्थान को हल धुआ कहा जाने लगा, जो कालांतर में हरदुआ हो गया। वहीं दाऊजी के सेनापति हरदेव ने जिस निकटतम स्थल पर पैंठ लगवाई, उस स्थान को आज हरदुआगंज के नाम से जाना जाता है।
यहां पृथ्वीराज चौहान द्वारा स्थापित काली माता का मंदिर भी है। वहीं, हिंदी साहित्य के क्षेत्र में भी हरदुआगंज की एक अलग पहचान है। वर्ष 1859 में पंडित रूपराम के यहां जन्मे बालक महाकवि नाथूराम शंकर शर्मा ने हिंदी साहित्य में अपने ज्ञान का लोहा मनवाते हुए महाकवि की उपाधि हासिल की। ‘शंकर’ ने कानपुर से अपनी लेखनी शुरू की और वहां से प्रकाशित ब्राह्मण पत्रिका में उन्होंने अपने लेख देने शुरू किए। बाद में नौकरी छोड़कर हरदुआगंज लौटने पर रचनाएं लिखीं।
जलाली कस्बे के निकट शेखाझील पक्षी विहार है। 40 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैली झील पर अक्तूबर से विदेशी परिंदों की आमद शुरू हो जाती है। मार्च के मध्य तक सभी मेहमान परिंदे वापस अपने स्थान पर लौट जाते हैं। यहां प्रतिवर्ष हिमालय की बर्फीली घाटियों से लेकर चीन, नेपाल, रूस, भूटान, पोलैंड तथा श्रीलंका से परिंदे आकर विचरण करते हैं। मेहमान परिंदों को देखने के लिए अलीगढ़ समेत निकटवर्ती जिलों के पक्षी प्रेमियों समेत एएमयू वाइल्ड लाइफ विभाग के प्रोफेसर और छात्र-छात्राएं भी यहां अध्ययन के लिए आते हैं। वर्ड सेंचुरी बनने के बाद झील पर प्रवेश शुल्क के रूप में 30 रुपये लिए जा रहे हैं।
एतिहासिक टप्पल किला
टप्पल का भी अपना एक इतिहास है। जब राजस्थान के राजा जवाहर सिंह पुत्र राजा सूरज सिंह का कार्यकाल 1763 से 1768 तक रहा। इसी दौरान उन्होंने दिल्ली पर साठ हजार सैनिकों और 100 तोपों के साथ आक्रमण किया। युद्ध जीतने के बाद दिल्ली के किले का एक गेट उखड़वा कर लाए थे। मुगल शासक की पत्नी को भी अपने साथ लेकर आ गए। इस पर महसूस हुआ कि दूसरे धर्म की महिला से समाज में गलत संदेश जाएगा तो उन्होंने अपने शिल्प सलाहकार सम्नू को मुस्लिम होने के नाते टप्पे वर्तमान में टप्पल रहने का हुक्म दिया और जीवन यापन के लिए क्षेत्र से लगान वसूलने को कहा। वर्तमान थाना टप्पल की बिल्डिग में सैनिको के रुकने के लिए बनवाया गया व रानी के रहने के लिए बगला बनवाया। अंग्रेजों के शासन आने बाद इस बिल्डिंग को तहसील का रूप दे दिया व वर्ष 1942 में इस बिल्डिंग में थाना बनाया गया। जो आज तक संचालित है।