मंगलवार शाम छह बजते ही प्रथम चरण के चुनाव के लिए प्रचार थम गया है। मतदान में अब चंद घंटे शेष हैं। चुनावी बिसात में डटे सभी राजनीतिक दलों को अपनी-अपनी रणनीति से आस बंधी हुई है कि वे इस चुनाव में पहले से बेहतर प्रदर्शन करेंगे। परिणाम उनके हक में आएंगे और जीत का सेहरा उनके प्रत्याशियों के सिर बंधेगा। हालांकि, कुछ दलों में भीतरघात और बागियों के तेवर अंतिम समय तक परेशान करते दिखे। राजनीतिक दलों को चुनाव प्रबंधन टीमें इन भीतरघातियों और बागियों का तोड़ निकालकर संतुष्ट करने में जुटे रहे। परिणाम क्या होंगे, ये 10 मार्च को ही सामने आएगा।
भाजपा को पिछले तीन चुनाव की तरह परिणाम की उम्मीद
बात हम सत्ताधारी भाजपा से शुरू करें तो मोदी लहर के 2017 के चुनाव में सातों सीटों पर कब्जा करने वाली भाजपा को इस बार भी पहले की ही तरह उम्मीद है। यह उम्मीद मजबूत यूं भी है कि भाजपा इस जिले में 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत से जीत दर्ज कर चुकी है। इसके पीछे मोदी लहर के साथ-साथ संगठन का प्रबंधन और रणनीति बड़ा कारण बना माना गया है। इस बार लहर पहले जैसी तो नहीं दिख रही। विरोध यानी एंटी इन्कंबेंसी भी अपना काम कर रही है। प्रबंधन और रणनीति जरूर पहले से और पुख्ता है। उत्तर प्रदेश में भाजपा के मुख्य स्टार प्रचारक चेहरे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चुनावी दौर में जिले में तीन दौरे किए हैं। पार्टी के तमाम दिग्गज लगातार जिले के रण को मथते रहे हैं। इस सबके दम भाजपा को पुराने परिणाम वापसी का विश्वास है।
गठबंधन को अलिखेश-जयंत की जोड़ी के हिट होने का भरोसा
इस बार प्रदेश में सपा-रालोद का गठबंधन चुनाव मैदान में है। इसी गठबंधन के क्रम में जिले की चार सीटें सपा व तीन रालोद के खाते में हैं। ये वही सीटें हैं, जिनमें से शहर, कोल, अतरौली व छर्रा पर सपा व खैर, बरौली व इगलास पर रालोद का 2012 के चुनाव में कब्जा हुआ था। दोनों दलों को उम्मीद है कि इस बार यह गठबंधन फायदेमंद रहेगा। इसको लेकर गठबंधन के दोनों दल एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं। जातीय समीकरण के साथ साथ विरोधी लहर और मुद्दों पर प्रहार इस गठबंधन की रणनीति व चुनाव प्रबंधन का अहम हिस्सा रहा है। खुद अखिलेश व जयंत ने जिले में दौरा कर संदेश देने का प्रयास किया है। परिणाम को लेकर भी यह दल बेहद आश्वस्त हैं।
बसपा ने लगातार दूसरी बार खेला मुस्लिम-दलित कार्ड
2007 के बाद से वापसी के लिए प्रयासरत बसपा ने इस बार भी जिले में मुस्लिम-दलित गठजोड़ का कार्ड खेला है। खुद बसपा अध्यक्ष मायावती जिले में आयोजित अपनी रैली में मुस्लिमों को यह संदेश देने का प्रयास करके गई हैं। भाजपा को हराने के लिए इस गठजोड़ को मजबूत बनाना बेहद जरूरी है। अब उनका संदेश कितना काम करेगा, यह तो परिणाम ही बताएंगे। मगर इतना जरूर है कि उन्होंने शहर व कोल सीट पर मुस्लिम चेहरे उतारे हैं। बता दें कि पार्टी 2007 में जिले की दो सीटों पर काबिज थी। उसके बाद से वापसी नहीं कर पाई है। इस बार पार्टी को अपने प्रबंधन व टिकट वितरण से बन रहे जातीय समीकरण से बेहतर वापसी की उम्मीद है।
कांग्रेस जिले में इस बार भी लड़ रही वजूद की जंग
2002 के बाद से जिले में जीत का स्वाद न चख पाने वाली कांग्रेस जिले में वजूद की जंग लड़ रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व हरियाणा प्रभारी कोल से इस बार भी दावेदार हैं। अन्य छह सीटों पर पार्टी मैदान में है, जिनमें से दो पर महिलाओं को मौका दिया गया है। परिणाम को लेकर पार्टी ने शहर व कोल पर काफी ताकत लगाई है। बेहतर प्रबंधन व रणनीति से चुनाव लड़ा जा रहा है। मगर परिणाम आने पर ही इस रणनीति का लाभ सामने आएगा।
पिछले चार चुनावों की तस्वीर
- 2017 के विधानसभा चुनाव में सातों सीटों पर भाजपा का कब्जा
- 2012 के चुनाव में चार पर सपा, तीन पर रालोद जीती
- 2007 के चुनाव में दो भाजपा, दो बसपा, दो रालोद, एक सपा
- 2002 के चुनाव में दो कांग्रेस, तीन बसपा, एक राक्रांपा, एक सपा