हाथरस की अनुसूचित जाति की बिटिया की मौत के मामले में प्रदेश सरकार ने फैसला सच सामने लाने के लिए लिया या फिर किसी दबाव में, मगर इतना जरूर है कि नार्को परीक्षण की रिपोर्ट की कानूनी मान्यता नहीं है। मतलब, इस रिपोर्ट को मुकदमे के ट्रायल (सत्र परीक्षण) के दौरान अदालत में बतौर साक्ष्य हिस्सा नहीं माना जाता। यह राय व्यक्त की है, अपने शहर के नामचीन अधिवक्ताओं ने। इन विधि विशेषज्ञों ने कहा कि सरकार या पुलिस अपनी संतुष्टि के लिए नार्को कराए, अलग बात है। यह उनके लिए जांच का हिस्सा हो सकता है। मगर, यह गैरजरूरी है।
- नार्को परीक्षण को लेकर 2013 में सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच का स्पष्ट आदेश है कि यह अमान्य है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने मत में स्पष्ट कहा कि इंजेक्ट करने के बाद नार्को परीक्षण करना, मतलब करंट लगाकर या दबाव में लेकर कुछ कहलवाने जैसा है। यह नहीं कराना चाहिए। कम से कम पीड़ित को तो बिल्कुल नहीं कराना चाहिए। अगर बेहद आवश्यक न हो तो। - ठा. बुद्धपाल सिंह वरिष्ठ अधिवक्ता
- नार्को परीक्षण का कानूनी आधार नहीं है। यह पुलिस अपनी संतुष्टि के लिए या किसी तह तक पहुंचने के लिए कराए तो इसकी कोर्ट में मान्यता नहीं है। पीड़ित पक्ष के नार्को का तो कोई औचित्य नहीं है। साथ ही बिना सहमति के भी किसी का नार्को नहीं कराया जा सकता। पीड़ित अपनी बात रख रहा है, पुलिस को उसकी जांच करनी चाहिए। जांच में अगर सही है तो उसके अनुसार और गलत है तो उसके अनुसार कार्रवाई करे। - रामबाबू शर्मा वरिष्ठ अधिवक्ता
- यह सही है कि कोर्ट में नार्को परीक्षण मान्य नहीं है। मगर इस मामले में सरकार ने सच जानने के लिए यह फैसला लिया है। पुलिस विवेचना में जरूरत पड़ने पर ऐसा किया जा रहा है। इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। सच्चाई आने के बाद उसके अनुसार पुलिस कोर्ट में चार्जशीट पेश कर सकती है । - नीरज चौहान युवा अधिवक्ता
- सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग के अनुसार, नार्को परीक्षण गैरवाजिब है। इस मामले में सरकार व प्रशासन शुरुआत से हुईं अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए ऐसा कदम उठा रही है, उल्टा पीड़ित को दबाव में लेने के लिए ऐसा किया जा रहा है, जो कि गलत है। जिस प्रकरण में इस कदर तूफान मचा हो, उस मामले में वैधानिक कदम उठाने चाहिए, जबकि नार्को की कोई वैधानिकता नहीं है। - चंद्रशेखर दीक्षित वरिष्ठ अधिवक्ता
नीरज चौहान एडवोकेट- फोटो : CITY OFFICE
चन्द्रशेखर एडवोकेट- फोटो : CITY OFFICE
बुद्धपाल सिंह एडवोकेट- फोटो : CITY OFFICE