न किसी की आंख का नूर हूं न किसी के दिल का करार हूं’। इसे लोग मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर का कलाम समझते हैं।
जबकि यह वास्तव में मेरे दादा उर्दू के प्रख्यात शायर मुजतर खैराबादी का कलाम है जो कि बहादुर शाह जफर के समकालीन थे। यह बात प्रसिद्ध शायर, गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर ने कही।
वह एएमयू के फारसी अध्ययन केंद्र द्वारा सोशल साइंस फैकल्टी के कांफ्रेंस हाल में आयोजित समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर उन्होंने और जामिया मिलिया के पूर्व कुलपति एस शाहिद महंदी ने मुजतर खैराबादी के काव्य संग्रह ‘खरमान’ का संयुक्त रूप से विमोचन भी किया।
जावेद अख्तर ने कहा कि मुजतर खैराबादी बहादुर शाह जफर के समकालीन थे। उनकी कुछ दुर्लभ रचनायें, जो किसी कारणवश प्रकाशित नहीं हो पायी थीं, आज वह खरमान के रूप में हमारे सामने मौजूद हैं।
उनकी चर्चित गजल ‘न किसी की आंख का नूर हूं आज तक लोगों की जुुबान पर चढ़ी हुई है। उर्दू के बड़े साहित्यकारों गोपीचंद नारंग, आले मोहम्मद सरूर और नियाज फतेहपुरी ने अपने शोध में इस भ्रांति को बहुत साफ तौर पर बताया कि ‘न किसी की आंख का नूर हूं गजल बहादुर शाह जफर से संबंधित न होकर मुजतर खैराबादी की रचना थी।
उसका उल्लेख बहादुर शाह जफर की रचनाओं में भी कहीं देखने को नहीं मिलता है। पीवीसी एस अहमद अली ने कहा कि जल्द ही इस संग्रह की प्रतियों को मौलाना आजाद लाइब्रेरी में उपलब्ध कराया जाएगा। दुर्लभ पुस्तकों के अध्ययन के लिए एक सेंटर की स्थापना भी होगी। इस अवसर पर प्रो. एके कासमी, निदेशक प्रो. आजरमी दुख्त सफवी आदि मौजूद थे।