इस विवाद की वजह पर अगर गौर करें तो नाथ संप्रदाय के महंत इस मंदिर के मुख्य कर्ता धर्ता हुआ करते थे। उनका 2013 में देहांत हो गया। उस समय उनके साथ नाथ संप्रदाय की बाई प्रेमा मंदिर की देखरेख में रहती थीं। साथ में सराय मिश्र के ही योगेश माहौर भी उनका सहयोग करते थे। मुख्य महंत के देहांत के कुछ समय बाद प्रेमा बाई हरिद्वार चली गईं। फिर पूरी जिम्मेदारी योगेश निभाने लगे। इस दौरान योगेश ने मंदिर के बाहर कुछ दुकानें भी बनवाईं और मंदिर की आय को ध्यान में रखकर उन्हें किराये पर उठा दिया।
चार-पांच माह पहले प्रेमा बाई यहां लौटीं तो उन्हें मंदिर में प्रवेश का योगेश ने विरोध कर दिया। स्थानीय लोगों की शिकायत और पुलिस के सहयोग से प्रेमा बाई को मंदिर में उनके कमरे में रुकवाया गया। तब से दोनों में तनातनी बनी हुई थी। इसी तनातनी में योगेश पक्ष ने प्रेमा बाई के सहयोगी लोगों पर एससीएसटी का एक मुकदमा भी दर्ज कराया था। जिसमें पुलिस ने चार्जशीट लगा दी। इधर, 28 अगस्त को योगेश की मंदिर में ही तबीयत बिगड़ी। इस पर खुद प्रेमाबाई ने उनके बच्चों को खबर दी। उन्हें सासनी गेट के अस्पताल ले जाया गया। जहां छह सात दिन में उनकी मौत हो गई। डॉक्टरों ने ब्रेन हेमरेज वजह बताया। परिवार ने मामले में हत्या का आरोप लगाया तो पुलिस ने पोस्टमार्टम कराया। उसमें भी बीमारी आई।
बावजूद इसके परिवार ने प्रेमा बाई व उनके समर्थकों पर गैर इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया। कहना था कि उन्हीं के तनाव में ब्रेन हेमरेज हुआ है। इसी वजह से इस मामले में दो पक्ष बने हुए हैं। इस मामले में साध्वी प्राची ने मौके पर ही पुलिस प्रशासन से कहा कि उनकी मौत के मामले में सच्चाई से जांच की जाए, जो सच हो। वही किया जाए। किसी दबाव में काम करने की जरूरत नहीं है। इस विषय को उन्होंने मुख्यमंत्री के सामने रखने का भी ऐलान किया।