कल्याण सिंह के देहांत के बाद उनकी सियासी जमीन वाले पश्चिमी यूपी व बुंदेलखंड के सियासी हालात भी लगातार बदल रहे हैं। वजह है प्रदेश में पिछड़े वर्ग से आने वाले 8 फीसदी लोधी वोट बैंक का नेतृत्व। इस नेतृत्व को कौन संभालेगा? कहीं बिखराव न हो जाए। इसी चिंता में कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह राजू काफी हद तक प्रयासरत हैं। साथ में भाजपा भी इस ओर देख रही है। इसी बिखराव को रोकने के लिए अलीगढ़ में इस आयोजन को कर प्रदेश भर से उनके समर्थकों को बुलाकर संदेश देने का प्रयास होगा।
ये हैं प्रभाव वाले जिले
अलीगढ़, हाथरस, एटा, कासगंज, बदायूं, बरेली, पीलीभीत, बुलंदशहर, बरेली, अमरोहा, संभल, बिजनौर, फर्रुखाबाद, फिरोजाबाद, मैनपुरी, हमीरपुर, झांसी, जालौन, रामपुर, उन्नाव, हरदोई, कन्नौज, महोबा, शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी, कानपुर आदि जिले हैं, जहां लोधी वोट 5 से 10 फीसद तक है। इन जातियों के साथ-साथ अन्य ओबीसी जातियों पर कल्याण सिंह का गहरा प्रभाव था। इन सभी जिलों से लोग इस आयोजन में बुलाए जा रहे हैं। इन जिलों की 35 से अधिका ऐसी विधानसभा सीटें हैं। जिन पर अब तक कल्याण सिंह के इशारे पर प्रत्याशी उतारे जाते रहे हैं।
जातीय समीकरण ये भी
प्रदेश में 50 फीसदी से अधिक ओबीसी आबादी का आंकड़ा है, जिसमें 8 फीसदी से अधिक लोधी वोट गिने जाते हैं, जिनका प्रभाव पश्चिमी यूपी व बुंदेलखंड के 50 करीब जिलों में सर्वाधिक है। कल्याण सिंह का इन पर गहरा प्रभाव तो था ही। लोधी वोट के साथ-साथ राम मंदिर आंदोलन के बाद उनका कुर्मी, केवट, मल्लाह, निषाद, कुशवाहा, जाट आदि वोटों पर भी पिछड़े नेता के रूप में गहरा प्रभाव रहा। जिनमें से 10 फीसदी यादव हटा दें तो अन्य ओबीसी जातियां काफी हैं।