अलीगढ़ के पड़ोसी जिले बरेली, बदायूं, बुलंदशहर, एटा, मैनपुरी, मथुरा और आगरा थे। इन जिलों में भाषा के तौर पर ब्रज बोली के रूप में पश्चिमी हिंदी प्रयुक्त होती थी। स्वाभाविक तौर पर अलीगढ़ के भी ज्यादातर बाशिंदे ब्रज ही बोला करते थे। सिर्फ 7.77 फीसदी ही उर्दूभाषी थे। इस क्षेत्र में ब्रज और उर्दू के अलावा अन्य भाषाएं उल्लेखनीय नहीं थीं। हां, मारवाड़ी, गुजराती, बांग्ला, पंजाबी और अंग्रेजी भाषा भी चंद लोग बोला करते थे। एक रोचक बात यह थी कि जनगणना में 49 लोगों ने अपनी भाषा जिप्सी बताई थी जिसे बोलने वाले अलीगढ़ के अलावा सिर्फ मिर्जापुर में थे। मुगल शासन काल में तमाम लेखकों की सक्रियता के बाद भी अलीगढ़ के इतिहास के शुरुआती दौर में किसी भी लेखक का नाम सामने नहीं आता है। अलीगढ़ के ही समकालीन स्थापित जिले बदायूं को प्रबुद्ध लोगों की धरती माना जाता था।
इस क्षेत्र में हाथरस के राजा दया राम को किसी हद तक साहित्य के संरक्षक के तौर पर माना जाता है। हाथरस को प्रसिद्ध फकीर बख्तावर की जन्मस्थली माना जाता है। बख्तावर ने हिंदी ग्रंथ सुनिसार की रचना की थी। इसके अलावा 1846 में जन्मे दल देवदास ने भी कृष्ण खंड के नाम से एक ग्रंथ की रचना की थी। बाद में अलीगढ़ में सर सैयद अहमद और उनके द्वारा स्थापित मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज के असर से लेखकों और बौद्धिक लोगों की बड़ी जमात सामने आई। सर सैयद ने 1864 में अलीगढ़ इंस्टीट्यूट एंड साइंटिफिक सोसायटी की स्थापना की थी। इसमें एक पुस्तकालय और एक प्रेस भी था। सोसायटी एक जर्नल प्रकाशित करती थी जिसका नाम अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट था। बाद में सोसायटी बंद हो गई थी।
लाइब्रेरी और प्रेस कॉलेज को स्थानांतरित कर दिए गए थे। कॉलेज सोसायटी की ओर से एक और पत्रिका अलीगढ़ मंथली प्रकाशित की जाती थी। अंग्रेजी में इसे कानपुर और उर्दू में अलीगढ़ से छापा जाता था। इसमें स्थानीय समाचारों के अलावा शिक्षा और धर्म से संबंधित लेख प्रकाशित हुआ करते थे। इसी दौर में फैज-ए-आम प्रेस से खातून नामक एक अहम पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ जिसका मकसद महिलाओं में शिक्षा और साहित्य समझ में इजाफा करना था। इसके अलावा अहमद प्रेस से बच्चों की उर्दू में पत्रिका रफीकुल-अतफुल भी प्रकाशित होती थी। इसका प्रकाशन पाक्षिक था। इसके अलावा 1905 में आलमगीर नाम की पत्रिका भी शुरू की गई थी जिसमें धार्मिक लेख प्रकाशित किए जाते थे। इस वक्त कट्टर इस्लामिक लेखों के लिए उर्दू-ए-मौला भी उल्लेखनीय था।
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स्रोतः अलीगढ़ का गजट 1909।