रोजाना विकास की नई परिभाषा गढ़ी जाती है, लेकिन एक गांव ऐसा है जहां के लोगों को विकास के मायने तक नहीं पता। बहरहाल, उनकी पुकार को भी हर कोई अनसुना कर देता है। आज भी इस गांव के बाशिंदे तकरीबन 25 साल पहले बने खड़ंजे पर चलने को मजबूर हैं।
जिला मुख्यालय से तकरीबन 15 किमी. दूर विकास खंड जवां के तहत आने वाले ग्राम पंचायत किढ़ारा के माजरे बेरिया का नगला में आबादी लगभग साढ़े छह सौ की है।
इस गांव में ज्यादातर लोग खुले में शौच करने को विवश हैं। एक भी यहां सरकारी स्कूल नहीं है। इस वजह से जब बच्चे 8-10 साल के हो जाते हैं, तब वह पढ़ने के लिए दूसरे माजरे शेरगढ़ जाते हैं।
दो सरकारी हैंडपंप हैं, जिसमें एक खराब है। गांव की सड़कें कटोरानुमा हैं, जो थोड़ी सी भी बारिश में डूब जाती हैं। इससे लोगों की जिंदगी नरक हो जाती है। इस गांव में 95 फीसदी से ज्यादा दलित हैं।
गांव में वाकई समस्या है। गांव की बेहतरी के लिए अफसरों से बात की जाएगी। समाजसेवी मारिया आलम से भी ग्रामीण पीड़ा बता चुके हैं।
विपिन चौधरी, अध्यक्ष स्मार्ट विलेज फाउंडेशन