हालात और कारोबार का आपस में गहरा रिश्ता है। इस बात को राजकीय कृषि एवं औद्योगिक प्रदर्शनी (नुमाइश) में पहली बार आए राज सर्कस के मैनेजर शमीम खान बहुत अच्छे से समझ रहे हैं। वह कहते हैं कि सीएए और एनआरसी के कारण मुसलमानों ने नुमाइश का बहिष्कार कर रखा है। इसका बाकायदा एलान भी हुआ है। जिसके चलते सर्कस में बिल्कुल भी भीड़ नहीं आ पा रही है। हालत यह है कि चार शो की जगह सिर्फ दो शो चल रहे हैं। 15 दर्शकों के बीच शो चलाना पड़ रहा है।
शमीम खान कहते हैं कि बगैर मुसलमानों के यह मेला ही नहीं है। यहां पर आने वाले ज्यादातर दुकानदार भी मुसलमान हैं। हम 6 लाख रुपये तो ट्रांसपोर्ट पर खर्च करके आए हैं। 65 लोग सर्कस में शामिल हैं। इसमें 40 कलाकार हैं। हमारे यहां पर छह वर्ष पहले तक जानवर रहे हैं, लेकिन इनको लेकर लगातार बरती गई सख्ती के चलते हमें इनको चिड़ियाघर में देना पड़ा। जब जानवर हमारे यहां पर रहते थे तो उनका बहुत ध्यान रखा जाता था। जब हरिद्वार में सर्कस लगा तो शेर और अन्य जानवरों के पिंजरों को रुड़की मांस खिलाने लाया जाता था। यहां साफ सफाई के बाद उनको फिर से हरिद्वार ले जाया जाता था। अब यह सब अतीत की बात है।
घोड़ा तांगा खींच सकता है, हम क्यों नहीं रख सकते: कैथरीन
राज सर्कस में पिछले पांच दशक से काम कर रहीं मूलरूप से इंग्लैंड की रहने वाली डोला कैथरीन कहती हैं कि जब प्रधानमंत्री मोदी सबके लिए सोचते हैं तो सर्कस के कलाकारों के लिए क्यों नहीं सोचते? सड़क पर घोड़ा तांगा खींच सकता है, लेकिन हम उसे सर्कस में नहीं रख सकते। यहां तक कि कुत्ते और तोते भी रखने बंद कर दिए हैं। इसके चलते भी सर्कस के प्रति बच्चों का आकर्षण कम हुआ है। माता पिता की मृत्यु होने पर कैथरीन की दादी ने उनको सर्कस से जोड़ दिया था। पति रिंग मास्टर थे, जिनकी अब मृत्यु हो चुकी है। कभी हवा से हवा में जंप करने वालीं 57 वर्षीय डोला कैथरीन अब अपने बेटे के साथ परफोर्म करती हैं। वह निशाना लगाने वाली क्वीन बनती हैं। उनका दर्द है कि सरकार तक उनकी बात पहुंचे और विलुप्त हो रही इस विधा को बचाने के लिए सरकार अपने स्तर से कुछ प्रयास जरूर करे। केवल जानवरों के न रहने से कितने ही रिंग मास्टर बेरोजगार हो गए। बच्चों के लिए आकर्षण खत्म हो गया। सरकार को कम से कम सर्कस के लिए हाथी, घोड़े, ऊंट, तोते आदि की अनुमति देनी चाहिए।