एएमयू में बाहरी लोग घुस कर उसे सुरक्षित शरण स्थली की तरह उपयोग कर रहे हैं । शायद इन अराजक और बाहरी लोगों से गंभीर छात्र भी परेशान हों, लेकिन इंतजामिया की पेशानी पर कोई बल नहीं है। आपका निगरानी तंत्र कितना लचर है, इसी बात से पता चलता है कि बाहरी लोग आते हैं। किसी को बंधक बनाकर विश्वविद्यालय परिसर में लाते हैं। बेल्ट से पीटते हैं। मानवीय गरिमा को तार-तार करते हुए जूते से नाक रगड़वाई जाती है। और आरोपी खरामा-खरामा आराम से चला जाता है। पीटने वाला शख्स मुस्लिम, पीड़ित युवक हिंदू। इंतजामिया का रवैया लचर है। ऐसे में इंतजामिया पर इस तालीम की नगरी को सांप्रदायिकता की आग में झोंकने का इल्जाम लगे तो अचरज की बात नहीं। ऐसे में बाहरी लोगों को भी अपनी मजहबी दुकान चलाने का पूरा मौका मिल रहा है।
बृहस्पतिवार को दो समुदायों के छात्रों का आमने-सामने आना बेहद चिंता का विषय है। उन छात्रों को भी क्या कहिए जो सिर्फ मजहब के नाम पर हिंसक तत्वों की हिमायत में आ जाते हैं। साफ है कि एएमयू सुलग रहा है। इंतजामिया का ढीला रवैया जारी रहा तो माहौल बिगाड़ने में देरी नहीं लगेगी।
एएमयू में अहिंसा के पुजारी बापू ने तीन बार (1916, 1920 और 1929 में) दौरा किया था। बापू के एएमयू में हिंसा और अराजकता न सिर्फ चिंताजनक है बल्कि शर्मनाक भी है। अगर एएमयू इंतजामिया हाथ पर हाथ धरे बैठा है तो स्थानीय पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वह अपना निगरानी तंत्र मजबूत रखे और समय रहते कठोर कार्रवाई करे। समय रहते एहतियाती कदम नहीं उठाए गए और स्थिति हाथ से निकलेगी तो फिर लकीर पीटने के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता।