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AMU: चार रुपये में ग्रीन ईंट देगा एएमयू, सर्दी में गर्म करेगी कमरा, गर्मियों में रखेगी ठंडा

Tue, 24 Feb 2026 03:13 PM IST
चमन शर्मा दीपक शर्मा, अमर उजाला, अलीगढ़

सार

सामान्य की तुलना में ग्रीन ईंट का वजन कम होने से इमारतों के पिलर और ढांचे पर बोझ कम पड़ेगा। पारंपरिक ईंटों के उलट, इन्हें आग में पकाने की जरूरत नहीं पड़ती। इन्हें सांचे में ढालकर प्राकृतिक हवा और धूप में सुखाया जाता है। 
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तैयार ग्रीन ईंट और ब्रिक मॉडल - फोटो : स्वयं
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विस्तार
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अगर घर की दीवारें सर्दी में गर्म और गर्मी में ठंडी रहें, वह भी आधी कीमत पर तो यह निर्माण जगत के लिए बड़ी खबर है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) ने गोबर, राख और चूने से बनी ऐसी ग्रीन ईंट बनाई है, जिसमें खर्च महज चार रुपये हुए।

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बाजार में सामान्य ईंट की कीमत लगभग आठ रुपये है। इसका वजन करीब ढाई किलो होता है, लेकिन एएमयू की ईको-फ्रेंडली ईंट सामान्य की तुलना में करीब 50 फीसदी सस्ती होने के साथ साथ वजन में भी 60 फीसदी (900 ग्राम) तक हल्की है। खास बात यह है कि इस ग्रीन ईंट के इस्तेमाल से कमरा सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडा रह सकता है। इन्हीं प्रभावों के चलते खोज पूरी होने के बाद एएमयू ने इस उत्पाद पर पेटेंट भी हासिल कर लिया है। जल्द ही इसके उत्पादन को लेकर कंपनियों से करार किया जा सकता है।

एएमयू के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. मेहमूद अनवर का कहना है कि सामान्य की तुलना में ग्रीन ईंट का वजन कम होने से इमारतों के पिलर और ढांचे पर बोझ कम पड़ेगा। पारंपरिक ईंटों के उलट, इन्हें आग में पकाने की जरूरत नहीं पड़ती। इन्हें सांचे में ढालकर प्राकृतिक हवा और धूप में सुखाया जाता है। इससे न तो धुआं निकलता है और न ही उपजाऊ मिट्टी की बर्बादी होती है। इसे बनाने में 25 फीसदी गोबर, 60 फीसदी फ्लाई ऐश, पांच फीसदी चूना और 10 फीसदी मिट्टी का मिश्रण मजबूत परिणाम देता है।

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ऊष्मा रोधी, तापमान संतुलित
प्रो. अनवर का दावा है कि यह ईंट ऊष्मा रोधी (थर्मल इंसुलेटिव) है। इससे बने कमरे में तापमान संतुलित रहता है यानी सर्दियों में गर्माहट और गर्मियों में ठंडक का अनुभव होगा। प्रयोगशाला के परीक्षण में ईंट की संपीडन शक्ति (कंप्रेसिव स्ट्रेंथ) लगभग 16.5 एमपीए तक पाई गई, जो पारंपरिक ईंटों के बराबर या बेहतर मानी जाती है। जल अवशोषण दर 12.7% से 17.2% के बीच रही, जो मानकों के अनुरूप है।

पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ
यह तकनीक औद्योगिक कचरे (फ्लाई ऐश) और कृषि अपशिष्ट (गोबर) का उपयोग करती है। इससे प्रदूषण कम होगा। साथ ही मिट्टी की खोदाई कम होगी और ग्रामीण क्षेत्रों में कम लागत पर आवास निर्माण संभव होगा। प्रो. मेहमूद अनवर के अनुसार, यदि सरकार इस तकनीक को प्रोत्साहन दे तो यह सस्ते आवास निर्माण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में अहम भूमिका निभा सकती है।
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