बचाव पक्ष के अनुसार पुलिस ने तब बसपा के बैनर तले सियासत कर रहे तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष सुधीर चौधरी (अब भाजपा में सक्रिय) निवासी ताहरपुर टप्पल को साजिश का आरोपी बनाते हुए घटना का खुलासा किया। कहा कि सुधीर के द्वारा ये हत्या शूटरों से कराई गई है। क्रमवार सुधीर सहित नौ नाम उजागर किए। कुछ आरोपी गिरफ्तार किए गए और कुछ ने कोर्ट में सरेंडर किया। लंबी जद्दोजहद के बाद जिला पंचायत अध्यक्ष रहते सुधीर को भी जेल जाना पड़ा। पुलिस ने तीन किस्त में सभी पर चार्जशीट दायर की। न्यायालय में सत्र परीक्षण शुरू हुआ।
बचाव पक्ष से प्रताप सिंह राघव, नीरज चौहान, चौ.बलवीर सिंह, राम गोपाल गौतम, इस्माइल खां आदि अधिवक्ता पैरवी कर रहे थे। सभी ने पुलिस की कहानी पर सवाल उठाते हुए तर्क पेश किए। घटना के चश्मदीद गवाह राजू की गवाही अहम मानी गई। जिसने यह कहा कि कोई दो लोग रास्ते से ज्ञानी ने गाड़ी में बैठाए थे। उन्हीं ने गोली चलाई, जिन्हें वह पहचानता नहीं है, जबकि अदालत में हाजिर किसी आरोपी के मौके पर होने से इंकार कर दिया। साथ में अन्य गवाहों की कहानी में मिलान न होने पर बचाव पक्ष ने बल दिया। इन्हीं तमाम आधार पर 29 मार्च को न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए सभी को बरी कर दिया।