ईंट-भट्ठा एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष ठाकुर जनक पाल सिंह ने बताया कि जिले में इस समय करीब 500 ईंट-भट्ठों से ईंटों का उत्पादन होता है, लेकिन अभी भी किसी में कार्य शुरू नहीं हुआ है। गंगीरी क्षेत्र के पचौरी ईंट उद्योग के दीपू पचौरी और बजरंग ईंट उद्योग के संचालक विजय अग्रवाल ने बताया कि ईंट-भट्ठों पर इस समय ईंट पथाई की जा रही है। एक ईंट भट्ठे पर सभी कार्यों के लिए 100 से 120 लोगों को विभिन्न प्रकार के कार्यों में लगने से रोजगार मिलता है। जिले में लगभग चार माह ही ईंटों का उत्पादन होता, इसके बाद बारिश होने पर कार्य बंद हो जाता है, फिर प्रशासनिक अनुमति नहीं मिलती है। 15 फरवरी से भट्ठों में ईंट लगाने का काम शुरू कर दिया जाएगा और एक मार्च तक उन्हें पूरा कर भट्ठों में आग डाली जाएगी।
यह हुए मुख्य बदलाव
- 2012 से पहले बने उन भट्ठों जिनके पास प्रदूषण विभाग की एनओसी नहीं थी, उन्हें वैध माना जाएगा, लेकिन उन्हें जिला पंचायत, वाणिज्य कर और खनन विभाग के उससे पहले के दस्तावेज दिखाने होंगे।
- जिग-जैग तकनीक का अनिवार्य इस्तेमाल बरकरार रखा गया है। बाग, स्कूल और बस्तियों से ईंट भट्ठों को 800 मीटर की दूरी बनाए रखनी होगी। पहले यह सीमा एक किलोमीटर थी।
- ईंट भट्ठों के चारों ओर 10 मीटर की हरित पट्टी बनानी होगी। धूल रोकने के लिए पानी का छिड़काव किया जाना अनिवार्य किया गया है। निगरानी के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक समिति बनाई जाएगी।
- दो ईंट भट्ठों के बीच की दूरी अब एक किलोमीटर होगी। पहले यह 800 मीटर थी। ईंट भट्ठा लगाने के लिए कम से कम दो एकड़ क्षेत्रफल होना जरूरी होगा। चिमनी की ऊंचाई और धुएं के उत्सर्जन मानक भी तय किए गए हैं।