अलीगढ़। प्रेम विवाह करने से खफा परिजनों ने मुझसे मुंह मोड़ लिया। भाई शक्ल तक देखना पसंद नहीं करते थे। शादी के बाद पहला रक्षाबंधन आया तो मेरी आंखों में आंसू थे। ऐसे में मेरे पति के बचपन के मित्र, जो मुस्लिम हैं, सामने आए और मुझे भाई की तरह न केवल मानसिक संबल दिया, बल्कि राखी बंधवाकर चेहरे पर खुशी ला दी।
यह आप बीती है सपा लोहिया वाहिनी के जिलाध्यक्ष आशीष मोहन यादव की पत्नी मोनिका की। रक्षाबंधन पर अपने अतीत के पन्ने कुरेदते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने तीन साल पहले प्रेम विवाह किया था। चूंकि मैं ब्राह्मण परिवार से हूं इसलिए परिजनों को यह संबंध स्वीकार नहीं था। शादी के बाद जब पहला रक्षाबंधन आया तो मैं बहुत व्यथित थी। उम्मीद थी कि कम से कम मेरे भाई मेरा साथ देंगे और हर बार की तरह राखी बंधवाकर आशीर्वाद देंगे, लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा था, मेरी अकुलाहट बढ़ रही थी। आंखों में आंसू थे तो भाइयों से मिलने की छटपटाहट भी। तभी मेरे विवाह में मददगार रहे पति के बचपन के मित्र अज्जू इशहाक आए और मेरे चेहरे के उड़े रंग को देख पूछ बैठे। बेटा क्या बात है? त्योहार पर क्यों रोनी सूरत बना रखी है? जब मैंने अपनी व्यथा उन्हें बताई तो उन्होंने बगैर समय गंवाए अपनी कलाई मेरे आगे कर दी और बोले तेरा भाई हाजिर है? यह सुनते ही मेरी आंखों से खुशी के आंसू बरस पड़े? मेरा मुस्लिम भाई भले ही सपा का महानगर अध्यक्ष है, लेकिन अपनी सियासी व्यस्तता के बावजूद हर साल रक्षाबंधन एवं भाई दौज पर मुझसे राखी व टीका कराना नहीं भूलता।
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सभी धर्मों व त्योहारों का करता हूं सम्मान
अलीगढ़। सपा के महानगर अध्यक्ष अज्जू इशहाक ने बताया कि मैं और मेरा परिवार शुरू से ही सभी धर्मों और उनके त्योहारों में आस्था रखता है। लेकिन रक्षाबंधन का हमारे लिए विशेष महत्व है। मैं अपनी बहन शाजिया और मोनिका के अलावा भी विक्रम कॉलोनी निवासी क्लासमेट बीनू चौधरी भी मुझे राखी बांधती है। मेरी मां भी अपने हिंदू भाई सच्चानंद केशवानी को राखी बांधती हैं।
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...जब मददगार बन गए रिश्तेदार
चेतन आश्रम, रावण टीला में भी त्योहार का माहौल है। जोर-शोर से रक्षाबंधन की तैयारियां चल रही हैं। आश्रम में रहने वाली चारों लड़कियां त्योहार की तैयारियों में लगी हुई हैं। राखी खरीदने से लेकर पूजा के थाल का इंतजाम हो चुका है। अब बस इंतजार है तो अपने भाईयों का। भाई भी कोई और नहीं आश्रम को चलाने वाले मददगार है। तो क्या हुआ उनके साथ लड़कियों का खून का रिश्ता नहीं है। लेकिन रिश्तेदार बने मददगार भी भाई का रिश्ता निभाने में पीछे नहीं रहते हैं। आश्रम की संचालिका पुनीता चेतन ने बताया कि आश्रम में रहने वाली चारों लड़कियां प्रज्ञा आठ, मुस्कान नौ, रूबी 15 और प्रीती 18 वर्ष आश्रम के मददगारों के साथ त्योहार मनाती हैं। वो ही इनके रिश्तेदार बन चुके हैं। मददगार भी इन्हें किसी कमी का एहसास नहीं होने देते हैं। रक्षाबंधन से लेकर दौज तक इन बच्चियों के साथ मनाते हैं। भाई का फर्ज निभाते सुरक्षा का भरोसा दिलाने के साथ-साथ उन्हें उपहार भी देते हैं। इतना ही नहीं दीवाली पर इन्हें मिठाई खिलाना नहीं भूलते हैं। आश्रम भी लड़कियों के खानपान से लेकर उनकी शिक्षा तक का इंतजाम कर रहा है।