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क्या सर सैयद के सपनों को साकार कर रहे हैं हम

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क्या सर सैयद के सपनों को साकार कर रहे हैं हम
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ब्यूरो, अमर उजाला अलीगढ़।

आज जब हम सर सैयद की 200वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तब यह विचार करने की आवश्यकता है कि क्या अलीग बिरादरी और विशेष रूप से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने सर सैयद के सपनों को साकार किया है अथवा हम उद्देश्य में कहीं भटक गए हैं।

सर सैयद पर पुस्तकें लिख चुके एएमयू के पूर्व मीडिया सलाहकार डॉ. जसीम मोहम्मद का कहना है कि सर सैयद मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों और धार्मिक अंधता को समाप्त करना चाहते थे। सर सैयद का मानना था कि हिंदुस्तानी मुसलमानों ने सैकड़ों गैर-इस्लामी रीति रिवाजों को अपना रखा है जिन्हें उन्हें समाप्त करना चाहिए, ताकि उनका दिमाग खुल सके। सर सैयद मुसलमानों में व्याप्त कुरीतियों के भी विरोधी थे। उनका मानना था कि विवाह और अन्य सामाजिक उत्सवों के अवसर पर जिस प्रकार मुसलमान अपव्यय करते हैं, वह उचित नहीं है। इसी प्रकार सर सैयद ने कहा था कि सभी दिमागी बीमारियों में चापलूसी सबसे अधिक खतरनाक बीमारी है।
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सर सैयद के अलीगढ़ आंदोलन में स्वच्छता एक महत्वपूर्ण अंग है। वे बोर्डिंग हाउस में छात्रों के स्वच्छ रहने का न केवल आदेश देते थे, बल्कि यह चैक भी करते रहते थे। आज सर सैयद के 200 वीं वर्षगांठ के अवसर पर जब एएमयू जगमगा रहा है तब हमें यह विचार करने की आवश्यकता है कि क्या अलीगढ़ बिरादारी और एएमयू सर सैयद के उद्देश्य को धरातल पर लागू करने में सफल रहे। उन्होंने कहा कि 200 साल के उपरांत हम देखते हैं कि सर सैयद का अलीगढ़ आंदोलन और एमएओ कॉलेज की स्थापना दरअसल मुसलमानों के शैक्षिक सशक्तीकरण की थी। इसमें कोई शक नहीं कि सर सैयद मुसलमानों का विज्ञान आधारित सशक्तीकरण चाहते थे, परंतु सर सैयद ने शैक्षिक आंदोलन में सामाजिक सुधार को एक बहुत महत्वपूर्ण अंग माना है। सर सैयद ने आक्सफोर्ड और कैंम्ब्रिज की तरह आवासीय शिक्षा पर जोर दिया था, ताकि छात्रों का संपूर्ण व्यक्तित्व विकसित हो सके।
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