न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
एतकाफ (ठहरना या रुकना) को इस्लाम में फर्ज का दर्जा हासिल नहीं है। मगर, सुन्नत और वाजिब जरूर है। मस्जिदों में एतकाफ के लिए बैठे रोजेदार दिन-रात अल्लाह की इबादत कर रहे हैं।
रमजान महीने को दस-दस रोजे को अशरे में बांटा गया है। दस दिनों तक रोजेदार मस्जिद में कुरान की तिलावत और इबादत में मशगूल रहेंगे। यह रोजेदार तभी मस्जिद से बाहर निकलेंगे, जब ईद का चांद निकल आएगा। जंगलगढ़ी बाहर वाली मस्जिद में शारिक इरशाद लगातार छह साल से एतकाफ में बैठ रहे हैं।
क्या है एतकाफ
एएमयू के सुन्नी थियोलॉजी विभाग के शिक्षक मुफ्ती डॉ. मोहम्मद जाहिद खान ने बताया कि किसी एक जगह अल्लाह की रजा (खुशी) के लिए बैठना। रमजान के आखिरी दस रोजे तक मस्जिद में पुरुष व घर के एक कोने में महिला एतकाफ में बैठ सकती है। उन्होंने कहा कि पैगंबर मोहम्मद मुस्तफा (सअ) अपनी जिंदगी के आखिरी दो-तीन साल मस्जिद-ए-नबवी में एतकाफ में बैठे थे। उन्हीं से एतकाफ की शुरुआत हुई।