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Kasganj: इस गांव की मिट्टी में है आजादी के मतवालों की गौरव गाथा, पर आज गुमनामी में जी रहे परिवार

Fri, 12 Aug 2022 03:09 PM IST
धीरेन्द्र सिंह संवाद न्यूज एजेंसी, कासगंज
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Kasganj freedom fighters - फोटो : अमर उजाला
कासगंज के  किसरोली मार्ग पर बसा ग्राम नरोली अपने आगोश में आजादी के इतिहास को समेटे हुए है।  इस गांव से पांच स्वतंत्रता सेनानियों ने एक साथ आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया। आजादी की खातिर जेल की यातनाएं सही, लेकिन आज इन स्वतंत्रता सेनानियों के परिजन गुमनामी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

 आजादी को पाने में जिले के स्वतंत्रता सेनानी भी पीछे नहीं रहे। आजादी के इन दीवानों ने न दिन देखा न रात। इनके मन में बस एक ही जज्बा था कि बस देश किसी तरह से अंग्रेजों की दास्ता से आजाद हो जाए। इसके लिए  घर परिवार को भी छोड़ दिया। जेल जाने से भी वे पीछे नहीं हटे। ग्राम नरोली से देश की आजादी के लिए हिस्सा लेने वाले राम सिंह, रामलाल, उनके पुत्र नंद किशोर, लाल सिंह, टीकाराम ने देश की, आजादी की लड़ाई में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। इनमें से लाल सिंह को छोड़कर शेष स्वतंत्रता सेनानियों की पीढ़ियां गांव में ही रहती है, लेकिन ये पीढ़ियां अब गुमनामी का जीवन व्यतीत कर रही हैं। सरकार के द्वारा तमाम योजनाएं संचालित की जा रहीं है, लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों की पीढ़ियों के हिस्से में कोई भी योजना नहीं आई है। खेती किसानी आदि के माध्यम से ही वे अपने परिवार का भरण पोषण कर रही है।
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खंडहर हुआ आवास - फोटो : अमर उजाला

मुकुंदी ने बयां की आजादी की दास्तां

गांव  निवासी 105 वर्षीय मुकुंदीलाल ने  यादों को ताजा करते हुए बताया कि गांव में देश को आजाद करने का जज्बा था। ग्रामीण बरगद के पेड़ के नीचे एकत्रित होकर आंदोलन की रणनीति बनाते थे। उधर स्वतंत्रता सेनानी राम सिंह के पुत्र उमराव सिंह (82) बताते हैं कि उनके पिता के साथ गांव से लाल सिंह, रामलाल उनके बेटे नंद किशोर व टीकाराम ने भी आजादी की लड़ाई लड़ी। 26 जनवरी 1931 को कासगंज के गांधी मूर्ति से गिरफ्तारी हुई। 9 मार्च 1931 को जेल से पिता को रिहा किया गया। उनके पिता की मौत के बाद उनकी मां चंपा देवी को पेंशन मिलती थी, लेकिन अब किसी योजना का लाभ नहीं मिल रहा।
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स्वतंत्रता सेनानी राम सिंह - फोटो : अमर उजाला

स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों को नहीं करता कोई याद

पूर्व प्रधान चतुर भारती बताते हैं कि देश की आजाद कराने में स्वतंत्रता सेनानियों के साथ ही ग्रामीण भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे। ग्रामीणों को गांव के स्वतंत्रता सेनानियों का गांव होने पर गर्व है, लेकिन समय के साथ इस गांव को भुला दिया गया है। स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को कोई भी सुविधा नहीं मिल पा रही। किसी परिजन को आयोजित होने वाले समारोहों में बुलाया भी नहीं जाता।

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स्वतंत्रता सेनानी नंद किशोर - फोटो : अमर उजाला

अकेली संतान थे टीकाराम

स्वतंत्रता सेनानी नंद किशोर के पुत्र रघुवीर सिंह बताते हैं कि आजादी के आंदोलन के समय उनके पिता की शादी नहीं हुई थी। उनके साथ आजादी की लड़ाई लड़ने वाल स्वतंत्रता सेनानी टीकाराम अपने पिता लज्जापुरी की अकेली संतान थे। पिता के साथ एक माह की जेल काटी।
 
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बरगद का पेड़ - फोटो : अमर उजाला

पिता पुत्र एक साथ लड़े थे आजादी की लड़ाई

देश की आजादी की लड़ाई ग्राम नरौली निवासी रामलाल एवं उनके पुत्र नंद किशोर ने एक साथ लड़ी थी। देश के आजाद होने के कुछ दिनों बाद स्वतंत्रता सेनानी रामलाल की मृत्यु हो गई। जबकि स्वतंत्रता सेनानी नंद किशोर के पुत्र रघुवीर सिंह व मोहर सिंह एवं इनकी संतानें आज भी गांव में रहती हैं। 

लाल सिंह की स्मृतियां ही हैं शेष

 ग्राम नरौली निवासी स्वतंत्रता सेनानी लाल सिंह की गांव में अब स्मृतियां ही शेष रह गई हैं। उनके तीन बेटियां हैं। जिनकी शादी हो चुकी है। तीनों ही अपनी ससुराल में रहती हैं। उनका कोई बेटा नहीं हैं। गांव में उनका एक मकान है जो देखभाल के अभाव में पूरी तरह से खंडहर हो चुका है। जिसमें ग्रामीण अपने पशुओं को बांध लेते हैं।

बरगद के पेड़ के नीचे बनती थी रणनीति

 गांव का एक पुराना बरगद का पेड़ आजादी के आंदोलन का गवाह है। इस पेड़ के नीचे बैठकर ही आजादी के आंदोलन की रणनीति बनाते थे। ग्रामीणों ने इस पेड़ को सहेज कर रखा है। पेड़ के चारों ओर बाउंड्री करा दी है और  पास में ही  एक मंदिर का निर्माण कर लिया है। जिसमें ग्रामीण प्रतिदिन पूजा करने के लिए जाते हैं।
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