पनवारी कांड पर अदालत के फैसले से आहत हैं, न्याय के लिए लड़ेंगे। इस मामले को उच्च अदालत में लेकर जाए प्रशासन। यह कहना है पीड़ित परिवार का। आवास विकास कॉलोनी के सेक्टर चार में रहने वाले पनवारी कांड के पीड़ित भरत सिंह कर्दम ने बताया कि बहन मुंद्रा की शादी थी। नगला पद्मा से बरात आई थी। दबंगों ने ऐलान किया था दूल्हा घोड़ी पर बैठकर नहीं जाएगा। पिता चोखेलाल ने शासन-प्रशासन से शिकायत की। पुलिस-पीएसी तैनात कर दी गई। नेता और मीडिया भी पहुंची। मगर, दबंग नहीं माने। पुलिस के सामने बरात नहीं चढ़ने दी। हमला कर दिया। पुलिस को गोली चलानी पड़ी। वर-वधू सहित पूरे परिवार को किसी तरह पुलिस ने गांव से निकाला।
भरत ने बताया कि 32 साल पहले गांव से ऐसे निकले कि फिर वापस नहीं लौट सके। अपना घर और जमीन चली गई। शासन प्रशासन से जो मकान मिला, उसके हक की लड़ाई आज तक लड़नी पड़ रही है। न्याय पाने के लिए पहले पिता लड़ाई लड़ रहे थे। अब उन्होंने कोशिश की। फैसले से बहुत आहत हैं। भरत सिंह ने कहा कि पूरा परिवार टूट गया है। अब वो यही चाहेंगे कि शासन-प्रशासन इस मामले में उच्च अदालत में पैरवी करे, जिससे उन्हें न्याय मिल सके। आरोपियों को सजा मिलनी चाहिए थी। अभियोजन पक्ष ठोस पैरवी करने में नाकाम रहा।
पनवारी कांड के पीड़ित चोखेलाल की 24 अक्तूबर 2019 को मृत्यु हो गई थी। सरकार की ओर से मुहैया कराए गए मकान में उनके दो बेटे भरत सिंह और रूप सिंह का परिवार रहता है। भरत सिंह के तीन बेटे यशपाल, प्रेमपाल और जितेंद्र कुमार हैं। वहीं रूप सिंह की चार बेटियां और एक बेटा है। तीन बेटियों की शादी हो चुकी है। भरत सिंह का कहना है कि मकान की धनराशि अदा करने के लिए प्रशासन से शासन को रिपोर्ट गई थी। मगर, ऐसा हो नहीं सका। न्याय की लड़ाई लड़ते लड़ते पिता चोखेलाल की मौत हो गई। अब वो मकान को अपने नाम कराने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। मकान का लेंटर कई जगह से गिर चुका है। ऐसे में हर समय जान का खतरा बना रहता है। आवास विकास परिषद मकान भी बनवाने नहीं देता है। इसके लिए कोर्ट में वाद दर्ज कराया हुआ है। कोर्ट में मामला विचाराधीन है। परिवार मजदूरी करके किसी तरह अपना गुजर बसर कर रहा है।
भरत सिंह कर्दम ने बताया कि 21 जून 1990 को बहन की शादी थी। सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। मगर, दबंगों ने ऐलान कर दिया था कि बरात नहीं चढ़ने देंगे। इससे परिवार डर गया था। पिता चोखेलाल ने शासन प्रशासन के अधिकारियों के चक्कर लगाए। इस पर भी कुछ नहीं हो सका। बवाल होने पर अधिकारियों ने किसी तरह उन्हें परिवार को गांव से बाहर निकाला। दबंगों ने रास्ता रोकने के लिए सड़कों को खोद दिया था। पेड़ गिरा दिए थे। सेना भी आ गई थी। पुलिस ने दंगाइयों पर फायरिंग की, लेकिन वो नहीं माने। आखिर में किसी तरह निकाला गया।
घटना के समय तब तत्कालीन सांसद निहाल सिंह जैन, फिरोजाबाद के सांसद रामजीलाल सुमन, कांग्रेस जिलाध्यक्ष आजाद कुमार कर्दम, शहर अध्यक्ष ओपी जिंदल सहित मीडियाकर्मी भी मौजूद थे।
घटना के समय मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे, जबकि प्रधानमंत्री वीपी सिंह थे। पनवारी कांड के बाद जिलेभर में जातीय तनाव फैल गया था। इससे प्रदेश ही नहीं देश की सियासत भी गर्मा गई थी। घटना को दलितों पर अत्याचार के रूप में पेश किया गया था। तब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, पत्नी सोनिया गांधी के साथ आगरा आए थे। वह गांव में पीड़ितों से भी मिले थे। उन्हें कर्फ्यूग्रस्त इलाकों में जाने से रोक दिया गया था। पुलिस के रवैये पर कांग्रेसी भी भड़क गए थे।
पनवारी कांड के बांद जिले भर में जातीय संघर्ष हो गया था। जगह-जगह प्रदर्शन किए जा रहे थे। इस पर आधे शहर में कर्फ्यू लगाना पड़ा था। कई जगह हुए बवाल में पुलस को फायरिंग भी करनी पड़ी थी। लोहामंडी, जगदीशपुरा, शाहगंज, सिकंदरा, अछनेरा सहित अन्य इलाकों में घटनाएं हुईं। पहले दिन छह लोगों की जान गई थी। इसके बाद और भी जान गईं। इस पर सेना के साथ सीआरपीएफ को भी लगाया गया। दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए।
- 21 जून 1990 को शाम छह बजे बरात चढ़ाई होनी थी। सूचना पर फोर्स पहुंच गई।
कोर्ट में चोखेलाल, भरत सिंह, बेदरिया, सुभाष भिलावली, वादी निरीक्षक रमन पाल सिंह, एसआई वीरेंद्र पाल सिंह, डॉ. सतीश चंद शर्मा, तत्कालीन डीएम अमल कुमार वर्मा, तत्कालीन सीओ किशनलाल, सेवानिवृत्त एसडीएम शांति प्रकाश शर्मा, सिपाही क्लर्क हर स्वरूप शर्मा, आईजी कर्मवीर सिंह, सीडीओ श्रवण कुमार निगम, अधिवक्ता करतार सिंह भारतीय, रामजीलाल सुमन, पीएसी के कांस्टेबल नायक बलवीर सिंह, एसआई सीएल सचान, सिपाही ओमप्रकाश, सेवानिवृत्त निरीक्षक नरेंद्र कुमार, अतिरिक्त निदेशक शकुंतला सिंह और कार्यालय सहायक नूर मोहम्मद को पेश किया गया।
आरोपियों की ओर से पैरवी आगरा बार के अध्यक्ष प्रवीण कुमार श्रीवास्तव ने की। वहीं अभियोजन पक्ष की ओर से पूर्व में एडीजीसी महेश बंसल थे। इनके बाद एडीजीसी शशि शर्मा एवं मोहित पाल ने साक्ष्य और गवाह प्रस्तुत किए।