खेतों में पहुंचते ही नेताओं ने वादों की फसल खूब उगाई, लेकिन आलू राजा नहीं बन पाया। देश की बड़ी आलू बेल्ट में शुमार आगरा के किसानों को 15 साल से आलू प्रोसेसिंग यूनिट लगाने, रिसर्च सेंटर बनाने के वायदे किए जा रहे हैं, लेकिन यह वादे अब तक पूरे नहीं हुए। अब विधानसभा चुनाव से पहल फिर से यही वायदे किसानों को उनके आलू के खेतों के बीच सुनने को मिलेंगे। मतदान का जब समय होगा, तब आलू की खोदाई शुरू हो चुकी होगी। हाल की बारिश में हुए नुकसान के कारण इस बार भी आलू का मुद्दा अहम होगा।
घाटे का सौदा बन गई आलू की खेती
आगरा में 3.25 लाख हेक्टेयर जमीन पर खेती हो रही है। यहां गेहूं (1.25 लाख हेक्टेयर) के बाद आलू सबसे ज्यादा बोवाई वाली फसल है। औसतन हर साल 70 से 75 हजार हेक्टेयर में आलू हो रहा है। पैदावार की बात करें तो 280 क्विंटल प्रति हेक्टयर आलू की बोवाई है। आलू खरीद और व्यापार के लिए योजनाओं की कमी के कारण आलू की खेती घाटे का सौदा बनी हुई। बीते साल को छोड़ दें तो तीन से चार साल से लगातार किसान घाटा उठा रहे हैं। तीन साल पहले तो आलू को फेंकना पड़ा था। ऐसे में किसान आलू आधारित उद्योग और अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र की मांग कर रहे हैं। इससे विदेशों में निर्यात कर सकने वाले अच्छी गुणवत्ता का आलू पैदा हो सके। प्रोसेसिंग यूनिट लगने से आलू की खपत बढ़ेगी और किसान को सीधे लाभ मिलेगा।
1957 में खंदौली में शुरू हुई आलू की खेती
आगरा में पहली बार आलू की खेती खंदौली के गोविंदपुर गांव में शुरू हुई। यहां के चौधरी चेतराम सिंह ने आलू की बोवाई की। बीज पंत नगर से लेकर आए। लोग बताते हैं, जब आलू की खेती शुरू हुई तो दूर-दूर के गांवों के लोग इसे देखने आते थे, धीरे-धीरे इसकी खेती पूरे जिले में फैल गई। अभी भी खंदौली मुख्य केंद्र बना हुआ है।
किसानों के लिए मुसीबत
- घुमंतू पशु : घुमंतू पशुओं के झुंड फसलों को चौपट कर रहे हैं। दिन-रात किसान पहरेदारी कर रहे हैं। घुमंतू पशुओं के हमले में किसान आए दिन घायल भी हो रहे हैं।
- नहरों की सफाई : नहरों की सफाई न होने के कारण पानी नहीं पहुंचता। इससे किसानों को सिंचाई की बड़ी सुविधा से वंचित रहना होता है। सबमर्सिबल से सिंचाई से लागत अधिक पड़ती।
- डीएपी की किल्लत : इस बार किसानों को डीएपी की किल्लत भी झेलनी पड़ी। एक-एक कट्टे के लिए किसानों को लाइन में लगना पड़ा। बोवाई के वक्त ज्यादा परेशानी रही।
किसानों को छला, हर सरकार ने किया निराश
समर्थन मूल्य घोषित करने के बाद भी केंद्र बनाकर इनकी खरीद नहीं होती। लागत अधिक और कम कीमत के कारण घाटा हो रहा है। आलू प्रोसेसिंग यूनिट और अनुसंधान केंद्र के नाम पर नेताओं ने किसानों को छला है। - राजवीर लवानियां, जिलाध्यक्ष भारतीय किसान यूनियन
खाद तक के लिए भटकना पड़ा
यूरिया-डीएपी ब्लैक में खरीदनी पड़ी। बारिश से भी फसलों का नुकसान हुआ है। जनप्रतिनिधियों ने शिकायत के बाद नुकसान का सर्वे तक नहीं कराया। आलू किसान की भलाई के लिए किसी नेता ने वादा नहीं निभाया। - गोविंद चौधरी
प्रोसेसिंग प्लांट से होता भला
आलू आधारित प्लांट लगने से किसानों को फसल की अच्छी कीमत मिलती। इससे यहां के लोगों को रोजगार मिलने के साथ ही किसानों का भी भला होता। अभी किसान लगातार इसकी खेती में नुकसान उठा रहे हैं। - शमशेर सिंह
घुमंतू पशु हैं बड़ी समस्या
घुमंतू पशु बड़ी समस्या बने हैं। फसल उजाड़ रहे हैं। दिन-रात रखवाली करनी पड़ रही है। आलू की बुवाई, सिंचाई से ज्यादा पशुओं से बचाने में मेहनत करनी पड़ती है। ब्लॉक स्तर पर बड़े-बड़े गोशाला बनवाए जाएं। - जयवीर सिंह