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यूपी पंचायत चुनाव: फिर 'जिंदा' हो गया मृत किसानों पर कांजी हाउस टैक्स, खंगाली जा रहीं फाइलें

Mon, 12 Apr 2021 12:25 AM IST
मुकेश कुमार अरुण अनु, अमर उजाला, मथुरा

सार

  • नामांकन प्रपत्र और एनओसी लेते समय जांची जा रही हैं कांजी हाउस टैक्स की फाइलें
  • 39 किसानों पर है जिला पंचायत का 15 हजार रुपये से अधिक का कांजी हाउस टैक्स
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पंचायत चुनाव। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मथुरा जिले में पंचायत चुनाव आते ही अंग्रेजों के शासनकाल के बाद किसानों पर लगा कांजी हाउस टैक्स फिर से जिंदा हो गया है। जिला पंचायत के कर्मचारी व अधिकारी इसकी फाइलों को फिर से खंगालने में जुट गए हैं। जो भी दावेदार नामांकन प्रपत्र और एनओसी के लिए जिला पंचायत में आ रहा है, उसके नाम को कांजी हाउस की फाइलों में भी देखा जा रहा है। फिलहाल जिला पंचायत के अधिकारियों को कांजी हाउस के बकाएदार 39 किसानों का इंतजार है।

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आजादी के बाद ग्रामीणों और किसानों पर कई प्रकार के टैक्स लगाए गए थे। इनमें से एक कांजी हाउस टैक्स भी था। किसान और ग्रामीणों से इस टैक्स को वसूलने की जिम्मेदारी जिला पंचायत की थी। समय बीतता गया, जिला पंचायत से जितना बना उतना कर वसूल लिया। इसके बाद जिला पंचायत में नए कर लगने लगे जिससे पुराना टैक्स लगना बंद हो गया। 

उसमें पशुशालाओं से संबंधित कांजी हाउस  टैक्स भी लगना बंद हो गया, लेकिन मांट, छाता और मथुरा तहसील के 39 किसानों से 15 हजार से अधिक रुपये का टैक्स जिला पंचायत के कर्मचारी नहीं वसूल सके। किसानों की टैक्स की फाइलें आज भी जिला पंचायत में अपने बकाएदारों का इंतजार कर रही हैं।

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दावेदार का कांजी हाउस की फाइलों में देखा जाता है नाम
पंचायत चुनाव में जो भी व्यक्ति दावेदारी करेगा, उसे जिला पंचायत, ब्लॉक तथा ग्राम पंचायत का किसी भी प्रकार का बकाया चुकाना ही होगा। इसलिए जब भी कोई ग्रामीण जिला पंचायत से नामांकन प्रपत्र खरीदता है और एनओसी प्राप्त करता है तो उसे ग्राम पंचायत का विभव कर, दुकानों का कर, हड्डी चमड़ा कर, तहबाजारी कर, अड्डा पड़ाव कर, कृषि फार्म कर आदि के अलावा कांजी हाउस कर में भी एनओसी प्राप्त करने वालों के नाम देखे जाते हैं।

क्या है कांजी हाउस टैक्स
गांव में किसान अधिकतर अपने पशुओं को लावारिस छोड़ देते थे, जिससे पशु किसानों की फसल खा जाते थे। इस पर नियंत्रण के लिए जिला पंचायत द्वारा गांवों में क्षेत्र वार पशुशालाएं खोल दी थीं। इन पशुशालाओं में खेतों में नुकसान करने वाले किसानों के बाहर घूमने वाले पशुओं को बांध दिया जाता था। जब किसान अपने पशु को लेने आता था उसे पशु तो दे दिया जाता था लेकिन उस पर टैक्स अध्यारोपित कर दिया जाता था। जिसे वह बाद में भी चुका सकता था। इस कर को ही कांजी हाउस टैक्स कहा जाता है।
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मर चुके हैं अधिकतर किसान
इसे सिस्टम की कमी कहें या फिर किसानों की लापरवाही, जिन किसानों के नाम इस फाइल में दर्ज हैं, उनमें 39 किसानों में से अधिकतर किसानों की मौत हो चुकी है लेकिन न तो किसानों के मरने की सूचना जिला पंचायत में दर्ज है और न ही इस किसानों से इस कर को वसूला जा सका है।

जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी सुधीर कुमार ने बताया कि किसी को भी एनओसी देने से पहले हम जिला पंचायत के सभी कर की फाइलों को चेक करते हैं ताकि यदि किसी किसान पर कोई टैक्स हो तो उससे वसूलकर एनओसी दी जा सके।
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