पटकों, टोपियों के अलावा कुछ नहीं
व्यापारी मनोज सिंघल ने बताया कि जब से टीवी आया, चुनाव प्रचार सामग्री आधी रह गई। मोबाइल, खासकर स्मार्ट फोन आने के बाद तो पूरी प्रचार सामग्री खत्म हो गई। अब पटकों, टोपियों के अलावा कुछ नहीं है। आयोग के प्रतिबंध लगे तो लोगों में चुनाव को लेकर क्रेज भी खत्म हो गया।
उसूलों की होती थी लड़ाई
दयालबाग के दामोदर दयाल बंसल ने कहा कि चुनावों का वो दौर अलग हुआ करता था। उसूलों पर लड़ाई होती थी। चुनावों में विकास हमेशा मुद्दा रहा। स्टीकर, बिल्ले दिखाई नहीं देते हैं अब। पहले चुनाव त्योहार लगता था। उल्लास और उमंग दिखती थी।
पहले दिखती थीं टोलियां
अलबतिया बालाजीपुरम निवासी शोभा चतुर्वेदी ने कहा कि महिलाएं पहले कम मतदान करने जाती थीं। उनके पास साधन नहीं थे। आज कहीं तक पहुंचने के सभी साधन उपलब्ध हैं। उस दौर में महिलाओं की टोलियां एक साथ मतदान करने निकलती थीं। अब कम दिखाई देता है।
चौपाल-गलियों में नहीं दिखता चुनावी बुखार
गांव की चौपाल हो या शहर की गलियां। चुनावी बुखार जो पहले शहर में दिखता था, वह अब दिखाई नहीं देता है। खंदारी के रहने वाले 75 साल के नंदलाल का कहना है कि अब माहौल ही नहीं लगता कि चुनाव है। व्हाट्सएप, टीवी, इंटरनेट ने हमें काफी कुछ दिया तो हमारा काफी कुछ छीना भी है।
नंदलाल कहते हैं कि पहले बस्तियों की गलियों में चाय की चुस्कियों के साथ चुनावी चर्चा का दौर चलता था। अब लोगों को एक-दूसरे से मिलने की फुर्सत ही नहीं है। टीवी पर घरों में लोग सभी कुछ देख लेते हैं।