आगरा। ताजमहल के 50 किमी. दायरे में फैले ताज ट्रेपेजियम जोन (टीटीजेड) की हवा में बंदिशों के बाद भी सुधार नहीं हो पाया है। वर्ष 2002 में टीटीजेड लागू होने से अब तक 24 सालों में ताजमहल पर हवा की गुणवत्ता में आमूलचूल बदलाव नहीं आ सका। चार करोड़ से ज्यादा पेड़ लगाने के दावों के बीच एक्यूआई और धूल कणों की मात्रा में कमी नहीं आई है। ताज ट्रेपेजियम जोन आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, हाथरस, एटा तथा भरतपुर जिलों के 10,400 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वर्ष 2002 से लेकर अब तक ताजमहल पर स्थापित किए गए मॉनिटरिंग स्टेशन का ब्योरा जारी किया है। इन आंकड़ों में बताया गया है कि ताजमहल, एत्माद्दौला, रामबाग और नुनिहाई मॉनिटरिंग स्टेशनों पर वायु प्रदूषण की नियमित निगरानी की जा रही है। ताजमहल पर दशहरा घाट की ओर बने बुर्ज पर लगे स्टेशन के आंकड़ों में वर्ष 2002 में सल्फर डाईक्साइड की मात्रा पांच थी, जोकि अब 4 है। इसी तरह नाइट्रोजन डाइक्साइड की मात्रा 22 की जगह 13 है। पीएम 2.5 कणों की निगरानी वर्ष 2013 से शुरू हुई। तब यह 96 थी जो अब 87 है। वर्ष 2024 में यह 101 तक पहुंच गई थी, जबकि मानक 60 है। इसी तरह पीएम-10 कणों की संख्या वर्ष 2002 में 147 थी, जो अब 133 पर है। सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर यानी एसपीएम में कमी जरूर आई है। यह वर्ष 2002 में 376 था, अब 218 पर हैं।
पीएम-10 में मामूली कमी
स्टेशन 2002 2025
ताजमहल 147 133
एत्माद्दौला 174 149
रामबाग 175 124
नुनिहाई 234 183
सिर्फ 6.82 फीसदी है जिले में हरियाली
आगरा में 15 सालों में चार करोड़ से ज्यादा पेड़ों को लगाने का दावा किया गया है। बीते 6 सालों में ही 2 करोड़ पौधे कागजों में लगाए गए हैं, लेकिन फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में वनावरण में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई। वर्ष 2023 की रिपोर्ट में आगरा के वन क्षेत्र में 0.32 प्रतिशत की वृद्धि हुई। अब यह 6.82 प्रतिशत हो गया है जो क्षेत्रफल में 274.73 वर्ग किमी है। यह कम से कम 33 फीसदी होना चाहिए। 11 साल पहले वर्ष 2015 में आगरा में वन क्षेत्र 6.78 प्रतिशत था, जो 2017 में घटकर 6.73 प्रतिशत रह गया। हरियाली के प्रति उदासीनता का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि वर्ष 2019 में जब भारतीय वन सर्वेक्षण, देहरादून की रिपोर्ट आई तो यह 6.50 प्रतिशत रह गया।
हकीकत में लगते पेड़ तो कम होता प्रदूषण
- जितने पेड़ कागजों पर लगाए गए हैं, उतने हकीकत में लगते तो आगरा की हवा सुधरती और प्रदूषण में भारी कमी आती। विकास कार्यों के नाम पर पेड़ों को बड़ी संख्या में काटा जा रहा है, जबकि अलाइनमेंट में बदलाव करके इन्हें बचाया जा सकता है। - शरद गुप्ता, पर्यावरणविद
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