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Agra News: मृत्युभोज पर राजस्थान में कानूनी पाबंदी, अन्य राज्यों में सामाजिक स्तर पर प्रतिबंध

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मृत्युभोज पर पाबंदी
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आगरा। भारत में मृत्युभोज पर कानूनी प्रतिबंध केवल राजस्थान राज्य में लागू है। यहां वर्ष 1960 से मृत्युभोज निवारण अधिनियम प्रभावी है। देश के अन्य राज्यों या विदेशों में इसे रोकने के लिए कोई विशिष्ट सरकारी कानून नहीं बनाया गया है। हालांकि, भारत के कई राज्यों में सामाजिक स्तर पर और विभिन्न समाजों द्वारा इस प्रथा पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं।
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प्रशासन और राजस्थान पुलिस शिकायत मिलने पर इस अधिनियम के तहत कानूनी कार्रवाई करती है और जुर्माना भी लगाती है। यह प्रथा गरीब परिवारों को कर्ज के जाल में फंसने से बचाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। विभिन्न समाजों और जाति पंचायतों ने अपने स्तर पर इस पर रोक लगाने के लिए सामूहिक निर्णय लिए हैं।

भारत में सामाजिक प्रतिबंध
बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कोई विशेष सरकारी कानून नहीं है, लेकिन पासवान समाज, अहीर/यादव समाज और कई स्थानीय ग्राम पंचायतों ने मृत्युभोज का पूर्ण बहिष्कार करने का सामूहिक निर्णय लिया है। इन समाजों का उद्देश्य गरीब परिवारों को अनावश्यक कर्ज से बचाना है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बिश्नोई, गुर्जर, साहू, कोसरिया पटेल, सेन, कुर्मी, लोधी और सतनामी समाजों ने अपनी सामाजिक नियमावली में मृत्युभोज पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा रखा है। इसमें मिठाई, फल और पकवान बनाने जैसी प्रथाएं शामिल हैं। हरियाणा और पंजाब में कई बड़ी खाप पंचायतों और जाट महासभाओं ने प्रस्ताव पारित करके मृत्युभोज की प्रथा को बंद कर दिया है। इन क्षेत्रों में अब केवल साधारण भोजन या शोक सभा की ही अनुमति दी जाती है।
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विदेशों में मृत्युभोज की स्थिति
दुनिया के किसी भी अन्य देश में मृत्युभोज पर रोक लगाने के लिए कोई सरकारी या राष्ट्रीय कानून नहीं है। पश्चिमी देशों और अधिकांश गैर-हिंदू समाजों में मृत्यु के बाद शोक सभा होती है। इन शोक सभाओं में लोग आते हैं और परिजनों को ढाढ़स बंधाते हैं। वहां भारत की तरह बड़े पैमाने पर खर्चीला और अनिवार्य भोज देने की कोई सामाजिक बाध्यता या कुप्रथा नहीं है। इसलिए, ऐसे किसी कानून की आवश्यकता भी नहीं पड़ी है। सांस्कृतिक अंतर के कारण विदेशों में मृत्यु के बाद की रस्में भारत से काफी भिन्न होती हैं।

मृत्युभोज के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
मृत्युभोज की प्रथा अक्सर गरीब परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ डालती है। इस प्रथा के कारण कई परिवार कर्ज में डूब जाते हैं। सामाजिक दबाव के चलते लोग अपनी क्षमता से अधिक खर्च करने को मजबूर होते हैं। विभिन्न समाजों और पंचायतों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का उद्देश्य इस आर्थिक बोझ को कम करना है। इन सामाजिक आंदोलनों से लोगों में जागरूकता बढ़ रही है और वे इस प्रथा को त्यागने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। यह एक सकारात्मक बदलाव है जो समाज के कमजोर वर्गों को राहत प्रदान कर रहा है।
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