19एमएनपी-14-कलक्ट्रेट स्थित जिला पंचायत कार्यालय
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मैनपुरी। आखिरकार एक महीने बाद जिला पंचायत के 16 करोड़ रुपये के टेंडरों में कमीशन लिए जाने के मामले में कार्रवाई हो ही गई। शासन ने टेंडर को पूल करने की बात को स्वीकार करते हुए उन्हें निरस्त कर दिया। इससे जिला पंचायत के अधिकारियों और ठेकेदारों को बड़ा झटका लगा है। जिला स्तरीय जांच में भी समिति ने टेंडर निरस्त करने की ही संस्तुति की थी। इसके बाद जिलाधिकारी ने निर्णय के लिए मामला शासन को भेज दिया था।
20 मई को जिलाधिकारी महेंद्र बहादुर सिंह से शिकायत की गई थी कि जिला पंचायत कार्यालय से उठाए जा रहे 16 करोड़ रुपये के 168 टेंडरों में दस से बीस प्रतिशत का कमीशन खुलेआम लिया जा रहा है। साथ ही ठेके कुछ लोगों को दिए जा रहे हैं। शिकायत का जिलाधिकारी ने संज्ञान लेते हुए मुख्य विकास अधिकारी नगेंद्र शर्मा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित कर जांच के आदेश दिए थे। समिति में अधिशासी अभियंता लोक निर्माण विभाग और वरिष्ठ कोषाधिकारी श्यामलाल जायसवाल को शामिल किया गया था। तीन दिन चली जांच के बाद समिति ने जिलाधिकारी को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें टेंडर प्रक्रिया को गलत बताते हुए निरस्त करने की संस्तुति की गई थी। साथ ही ऑनलाइन ई-टेंडरिंग कराने का भी सुझाव दिया गया था। जिलाधिकारी ने मामले में कोई निर्णय न लेते हुए मामला शासन को भेज दिया था। शासन ने सभी टेंडर निरस्त कर दिए हैं। अपर मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह ने जिलाधिकारी को इस संबंध में पत्र भेजा है। इसमें कहा है कि टेंडरों को चंद ठेकेदारों के माध्यम से पूल करने का प्रयास किया गया है। जिला स्तर पर जांच के दौरान भी जांच समिति ने टेंडर पूल करने के प्रयास के आधार पर ही उन्हें निरस्त करने की संस्तुति की थी।
पांच ठेकेदारों ने डाले थे 48 टेंडर
शासन ने अपने पत्र में ये भी स्प्ष्ट किया है कि जिला पंचायत के टेंडर में चंद ठेकेदारों द्वारा पूलिंग का प्रयास किया गया। कुल 168 टेंडरों के सापेक्ष बिक्री की गई निविदाओं में अकेले पांच ठेकेदारों ने 48 टेंडर डाले। इसमें श्याम सिंह, प्राइम कंस्ट्रक्शन, प्रदीप कुमार, एचएसबी कंस्ट्रक्शन, प्रदीप कुमार और सत्यस्वरूप शामिल हैं। ऐसे में इन ठेकेदारों की मुसीबत भी बढ़ सकती है।
राजनीतिक सिफारिशें नहीं आईं काम
जिला पंचायत के टेंडरों में कमीशनखोरी के बाद सत्ताधारी दल के नेताओं ने पक्ष में एड़ीचोटी का जोर लगाया। वह चाहते थे कि मामले में कोई कार्रवाई न हो। हालांकि मुख्य विकास अधिकारी की अध्यक्षता में गठित जांच समिति द्वारा टेंडर निरस्त किए जाने की संस्तुति के बाद ही उनके अरमानों पर पानी फिर गया था।