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ब्रज के लोक रंग नहीं बने ताज महोत्सव के अंग

Sat, 23 Jan 2016 01:30 AM IST
रैना पालीवाल
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हस्त शिल्प के प्रोत्साहन को लगने वाला ‘ताज महोत्सव’ लोक मेला नहीं बन पाया। ब्रज के लोक रंग इसके  अंग नहीं बन सके। न यहां सांझी खिलखिला सकी और न लोक गीतों की फुहार बरस सकी। हवेली संगीत, ढोला, रांझा, ख्याल गायन, नृसिंह लीला... आदि कलाओं को ताज महोत्सव के आंगन में जगह नहीं मिली। हर साल उद्घाटन पर फूलों की होली और चरकुला से इतिश्री कर ली जाती है। बाकी दिन बॉलीवुड व बाहर के कलाकार छाए रहते हैं। आगरा में होते हुए भी यहां के कलाकारोें को मंच नहीं मिल पाता। ताज महोत्सव ब्रज संस्कृति का समागम बन सकता था, लेकिन इसे दायरे में बांध दिया गया।
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हर साल फरवरी में ताज महोत्सव का आयोजन होता है। इस साल महोत्सव रजत जयंती मना रहा है। प्रोग्रामों की लिस्ट लंबी है, लेकिन ब्रज के कलाकारों की संख्या गिनी चुनी है। जबकि वृंदावन की सांझी कला बहुत प्रसिद्ध है। देवालयों में रंगों से सांझी बनाकर उसमें श्यामा श्याम की लीलाएं दर्शाई जाती हैं। गोबर से दीवार पर भी सांझी बनाई जाती है। ब्रज का लोक संगीत बहुत धनाढ्य है।
कवि सम्मेलन में भी स्थानीय कवियों की भागीदारी नहीं हो पाती। फिर कैसे कहा जा सकता है कि ताज महोत्सव आगरा की संस्कृति का संरक्षण संवर्धन कर रहा है। आगरा ब्रज का ही अंग है। ब्रज की सांस्कृतिक सीमा बहुत दूर तक फैली है।
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लोगों के विचार
साहित्यकार राज बहादुर राज ने बताया कि जब ताज महोत्सव ब्रज क्षेत्र में हो रहा है तो इसमें ब्रज की संस्कृति झलकनी चाहिए। कमेटी में प्रशासनिक अधिकारी होते हैं जो अपने मनोरंजन के लिए फिल्मी दुनिया के लोगों को बुलाते हैं। उससे बहुत कम बजट पर ब्रज के लोक कलाकार प्रस्तुति देने करे तैयार हैं। मैं हर साल ब्रज की लोक कलाओं के लिए आवेदन करता हूं। इस बार भी भगत, राजपूताना होली, ढोला गायन, ख्याल गोई के लिए आवेदन किया है पर स्वीकृति नहीं मिल पाई है। मैंने प्रशासन को ब्रज भाषा का कवि सम्मेलन कराने का प्रस्ताव दिया था लेकिन उसका भी कुछ नहीं हुआ।

नागरी प्रचारिणी सभा की सभापति स्वतंत्रता सेनानी रानी सरोज गौरिहार कहती हैं कि यह हमारी हमेशा की शिकायत है, ताज महोत्सव में स्थानीय कलाकारों को मंच नहीं मिलता। स्थानीय सांस्कृतिक कार्यक्रम भी वहां जगह नहीं बना पाते। यह ब्रज में हो रहा है तो यहां की संस्कृति को प्रमोट करना चाहिए।

कवयित्री डा. शशि तिवारी कहती हैं कि ताज महोत्सव में ग्लैमर पर ध्यान ज्यादा रहता है। लोक कलाओं, लोक संगीत की वहां कमी है। वैसे भी ताज महोत्सव आम पब्लिक की पहुंच से दूर होता जा रहा है। अफसर वर्ग के लोग ही वहां आसानी से जा सकते हैं।
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