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यमुना को ‘जहरीला’ बना रहा सल्फ्यूरिक एसिड

Fri, 12 Feb 2016 02:28 AM IST
राजीव शर्मा
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कालिंदी का पानी तेजाब से कम नहीं है। इसकी जलधारा चमड़ी तो दूर फसल को भी नुकसान पहुंचा सकती है। जलीय जीव-जंतुओं का जीवन तो संकट में है ही, क्योंकि इलेक्ट्रोप्लेटिंग इकाइयों में प्रयोग होने वाला हानिकारक रसायन सल्फ्यूरिक और नाइट्रिक एसिड सीधे यमुना में जा रहा है। ये दावा उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट में किया है।
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मुख्य पर्यावरण अधिकारी को भेजी गई रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि इलेट्रोप्लेटिंग में प्रयोग होने वाले सभी रसायन सीधे यमुना में जा रहे हैं। इनमें मुख्य सल्फ्यूरिक और नाइट्रिक एसिड हैं। बता दें कि ये रिपोर्ट इलेक्ट्रोप्लेटिंग के संबंध में इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई के बाद तैयार की गई है। बताया गया है कि ताज ट्रिपेजियम जोन की 31वीं बैठक (सात जनवरी 2015) में निर्णय लिया गया था कि महायोजना के अंतर्गत आवासीय क्षेत्र में संचालित इलेक्ट्रोप्लेटिंग इकाइयों को नगर निगम क्षेत्र से बाहर शिफ्ट किया जाए। इसके लिए छह महीने की समय सीमा तय की गई थी। इसके बावजूद ये इकाइयां स्थानांतरित नहीं हो पाई थीं। वायु और जल प्रदूषण का खतरा होने पर चार नवंबर 2015 को निर्णय इन्हें सील करने निर्णय लिया गया। इसके बाद शहर में संचालित लगभग 65 इकाइयों में से 25 को सील भी कर दिया गया है। इसके बावजूद शेष इलेक्ट्रोप्लेटिंग इकाइयां यमुना में जहर घोल रही हैं।

नहीं होता शोधन
बता दें कि इलेक्ट्रोप्लेटिंग इकाइयों में धातुओं से बनने वाली चेन आदि को चमकाने के लिए रसायन सल्फ्यूरिक एसिड, नाइट्रिक एसिड प्रयोग करते हैं। इन दोनों रसायनों का उपयोग करने के बाद इन्हें सीधे नालियों में बहा दिया जाता है। यह रसायन नालियों के माध्यम से सीधे यमुना में मिल जाता है। इलेक्ट्रोप्लेटिंग इकाइयों में रसायन युक्त पानी के शोधन की कोई व्यवस्था नहीं है।
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कैंसर तक हो सकता है
सल्फ्यूरिक एसिड बेहद खतरनाक है। रसायन विशेषज्ञ प्रशांत वशिष्ठ का कहना है कि वाटर वर्क्स पर नदी के पानी के क्लोरीनेशन के बाद भी पानी में सल्फ्यूरिक एसिड के प्रभाव को खत्म नहीं किया जा सकता। ऐसे में इस पानी के प्रयोग से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है। इस पानी के स्पर्श से चर्म रोग, पेट की बीमारी, दृष्टि दोष आदि हो सकता है।

फसल तक नष्ट हो सकती है
यमुना का पानी फसल के लिए भी हानिकारक हो सकता है। रसायन विशेषज्ञों के अनुसार, सल्फ्यूरिक युक्त पानी से फसल की जड़ें जल जाती हैं। इसकी वजह से पूरी फसल बर्बाद हो जाती है। इतना ही नहीं, जलीय जीव-जंतुओं के जीवन भी खतरे में पड़ जाता है।

नहीं लग सका प्लांट
पिछले साल 11 सितंबर को बैठक में मौजा लखनपुर निकट यूपीएसआईडीसी, सिकंदरा पर लगभग 75 किलो लीटर क्षमता का संयुक्त उत्प्रवाह शुद्धिकरण संयंत्र स्थापित करने का निर्णय लिया गया था। साथ ही इलेक्ट्रोप्लेटिंग इकाइयों को समूह में स्थापित करने का भी फैसला लिया गया। इस दिशा में भी कोई कार्य नहीं हो पाया है।

अब तक बंद नहीं हो पाए नाले
बता दें कि तमाम प्रयासों के बाद भी नालों को सीधे यमुना में जाने से नहीं रोका जा सकता है। हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने भी इन नालों को बंद करने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद अब भी दर्जनों नाले सीधे यमुना में जा रहे हैं।
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