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Taj Mahal: ताज में बदले गए उत्तर पश्चिमी बुर्जी के पत्थर, 45 लाख रुपये की आई लागत

Sat, 10 Jun 2023 10:21 AM IST
धीरेन्द्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, आगरा

सार

ताजमहल में करीब 375 साल बाद यमुना किनारे की बुर्जी के ब्रेकेट, गुंबद और छज्जे के पत्थरों को बदला गया। ठीक 100 साल पहले 1923 में दक्षिणी पश्चिमी बुर्जी का ब्रिटिश सरकार ने संरक्षण कराया था।
 
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ताज महल - फोटो : SELF
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विस्तार
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मकराना के सफेद संगमरमर से बनी ताजमहल में यमुना किनारे की छतरी पर पहली बार संरक्षण का काम किया जा रहा है। यह लाल बलुई पत्थर से बनी है। ब्रिटिश काल में कई बदलाव और संरक्षण कराए, पर मुगल काल के मूल पत्थर अब भी कई जगह हैं। लाल बलुई पत्थर से बनी उत्तर पश्चिमी बुर्जी के पत्थरों को 375 साल में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने पहली बार बदला है। यमुना किनारे की उत्तर पश्चिमी बुर्जी के गुंबद के पत्थर और पिलर के ब्रेकेट एक साथ बदले गए हैं।

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ताजमहल में शाही मस्जिद की ओर चमेली फर्श पर बनी उत्तर पश्चिमी बुर्जी पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 45 लाख रुपये की लागत से संरक्षण कार्य शुरू कराया है। लाल पत्थर से बनी बुर्जी के गुंबद, मेहराब, छज्जे, खंभे और छज्जों के नीचे बने डिजाइन वाले ब्रेकेट और क्लैंप को बदला गया है। एक साथ किया जा रहा यह संरक्षण कार्य बेहद मुश्किल था लेकिन एएसआई ने इसे चुनौती के रूप में लिया। यमुना किनारे की यह बुर्जी बेहद जर्जर हो चुकी थी, जिसके फोटो पर्यटक खींचकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर रहे थे।

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1652 से अब तक के संरक्षण का रिकाॅर्ड

ताजमहल के तामीर होने के बाद वर्ष 1652 से लेकर अब तक जो भी संरक्षण कार्य हुआ, उसका पूरा ब्योरा एएसआई के पास है। सबसे पहले इसके संरक्षण की रिपोर्ट 4 दिसंबर 1652 को औरंगजेब के दौरे की मानी गई है, जब औरंगजेब ने ताजमहल में पानी के रिसाव और नुकसान का ब्योरा तत्कालीन मुगल बादशाह शाहजहां को सौंपा था। मस्जिद और जमातखाना के गुंबद बारिश में रिसने की शिकायत का ब्योरा दिया था। इसके बाद 1666 से 1707 तक ताजमहल में किए गए संरक्षण कार्यों का रिकाॅर्ड रखा गया था।

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दक्षिणी पश्चिमी बुर्जी का 100 साल पहले संरक्षण

ताजमहल के मुख्य गुंबद के दक्षिणी पश्चिमी ओर बनी बुर्जी का संरक्षण ठीक 100 साल पहले किया गया था। 1923-24 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने ताज के दक्षिणी पश्चिमी बुर्जी को एक तरह से दोबारा ही बनवाया। यह पूरी तरह से जर्जर हो चुकी थी। एएसआई के पूर्व निदेशक डाॅ. डी दयालन की पुस्तक ताजमहल एंड इट्स कन्जरवेशन में इसका ब्योरा दिया गया है कि 1923 में इस बुर्जी के गुंबद में दरारें आ गई थीं। इसके लिंटेल, ब्रेकेट और पिलर पूरी तरह से खराब हो चुके हैं, जिन्हें बदला गया। इसी तरह लोहे की छड़ें निकालकर इसमें कॉपर की छड़ें और क्लैंप लगाई गईं।

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बंदरों ने काफी नुकसान पहुंचाया

अधीक्षण पुरातत्वविद डाॅ. राजकुमार पटेल ने बताया कि ताजमहल की उत्तर पश्चिमी छतरी पर काफी सावधानी से संरक्षण का काम किया जा रहा है। इसमें एक साथ चारों तल पर काम चल रहा है। बंदरों ने छज्जों के साथ ब्रेकेट को काफी नुकसान पहुंचाया था।
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