काली कलकत्ते वाली की उपपीठ और भक्तों की लगी भीड़
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तीर्थनगरी स्थित सिद्धपीठ बटुकनाथ काली कलकत्ते वाली की उपपीठ के नाम से प्रसिद्ध हैं। मंदिर के प्रांगण में सबसे प्राचीन वट वृक्ष स्थित है। यहां मां जया काली की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। मान्यता है है कि देवी मां के दर्शन और पूजन से भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है। मंदिर में आकर जात करने से काली कलकत्ते वाली की जात का फल प्राप्त होता है।
नवरात्र के दिनों में यहां चलने वाले यज्ञ में श्रद्धालु आहुतियां देकर पुण्य व मां के आशीष के भागी बनते हैं। मान्यता है कि जो श्रद्धालु काली कलकत्ते वाली की जात करने नहीं जा पाते वह अगर जया पीठ की जात कर लें तो उनकी जात पूर्ण मानी जाती है। इस पौराणिक मंदिर में प्राचीन वट वृक्ष भी सूकर क्षेत्र की पावन भूमि का गौरव है। यह चार प्राचीन वट वृक्षों में एक गिना जाता है।
वराह पुराण के अनुसार गृध वट सतयुग कालीन माना गया है। त्रेतायुगकालीन अक्षयवट इलाहाबाद में पाया जाता है। यह वाल्मीक रामायण में वर्णित है। द्वापर युगीन वंशीवट वृंदावन में स्थित है। यह श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित है। सिद्ध वट उज्जैन अवंतिका में स्थित है। गोरक्ष संवाद के अनुसार यह कलियुग का प्रमाण माना गया है।
तमाम सिद्ध पुरुषों की साधना स्थली
प्राचीन काल में भागीरथी गंगा इस वट वृक्ष को छूकर गुजरती थी। कालांतर में भौतिक परिवर्तनों के चलते गंगा की धारा यहां से 5 किलोमीटर आगे चली गई। आदि शंकराचार्य भी इस शक्ति पीठ में पधारे थे। उन्होंने यहां श्रीयंत्र की स्थापना की थी। तांत्रिक इस श्री यंत्र का पूजन कर सिद्धियां हासिल करते हैं। मंदिर के पुजारी मुन्ना लाल पाठक का कहना है कि वराह पुराण के 137वें अध्याय में एक कथा में बताया गया है कि एक गिद्ध वाण से घायल होकर यहां गिरा था, जिसने मनुष्य योनि प्राप्त की। यह स्थान तमाम सिद्ध पुरुषों की साधना स्थली है।