हाईकोर्ट से आए वादों की पोषणीयता के फैसले के बाद 12 अगस्त को इस केस की अगली सुनवाई की तिथि नियत की गई है। हाईकोर्ट में अब वाद बिंदु तय होंगे, उन्हीं पर ट्रायल चलेगा।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि-ईदगाह विवाद में बृहस्पतिवार को हाईकोर्ट से आए वादों की पोषणीयता के फैसले के बाद 12 अगस्त को इस केस की अगली सुनवाई की तिथि नियत की गई है। इस तिथि पर कोर्ट द्वारा वाद बिंदु तय होंगे। इन बिंदुओं पर ही केस का ट्रायल होगा। कुछ वाद बिंदुओं को जन्मभूमि पक्ष भी प्रार्थना पत्र के रूप में कोर्ट में दाखिल करेगा। कोर्ट को अगर वह उचित लगेंगे तो उन्हें भी वाद बिंदु के रूप में शामिल करेगी।
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श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष महेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि जन्मभूमि पक्ष के समर्थन में फैसला आने के पीछे हिंदू पक्ष द्वारा कोर्ट में दाखिल साक्ष्य महत्वपूर्ण रहे। इनमें कटरा केशवदेव भूमि के राजस्व अभिलेखों से लेकर नगर निगम का एसेसमेंट और इतिहास की तमाम पुस्तकों के साथ और एएसआई की सर्वे रिपोर्ट शामिल रही। उन्होंने कहा कि 22 फरवरी 2024 को हाईकोर्ट में सवाल किया गया था कि क्या ईदगाह कमेटी या फिर सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के पास ईदगाह मस्जिद संबंधी वैध दस्तावेज है।
उन्होंने कहा कि उपासना स्थल अधिनियम और लिमिटेशन एक्ट इस केस पर लागू नहीं है। न ही वक्फ बोर्ड की कोई भी ऐसी रुलिंग है, जो भगवान श्रीकृष्ण के मूल गर्भगृह को कब्जा मुक्त होने से रोक रही है। ईदगाह कमेटी और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के पास कोई भी ईदगाह से संबंधित ऐसा दस्तावेज नहीं है जो वैध हो।
वक्फ बोर्ड की पैरवी को चुनौती देगा हिंदू पक्ष
श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष एवं पक्षकार ने बताया कि शाही ईदगाह मस्जिद के नाम से कोई वक्फ संपत्ति एएसआई के अभिलेखों में दर्ज नहीं है। उनके द्वारा दाखिल आरटीआई के जवाब में वक्फ सर्वे कमिश्नर, लखनऊ कार्यालय इसको स्वीकार कर चुका है। जबकि वक्फ बोर्ड द्वारा प्रतिवादी के तौर पर वादों में पैरवी की जा रही है। उनकी पैरवी वैद्यता को अब 12 अगस्त को कोर्ट में चुनौती दी जाएगी कि जब वक्फ बोर्ड की यह संपत्ति नहीं है तो आखिर वक्फ बोर्ड पैरवी कैसे कर सकता है। देते हुए प्रार्थना पत्र मय साक्ष्य दाखिल किया जाएगा।
यह है श्रीकृष्ण जन्मभूमि-ईदगाह विवाद
श्रीकृष्ण जन्मभूमि से सटी शाही मस्जिद ईदगाह को हटाने का यह विवाद है। वर्ष 1968 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह कमेटी के बीच ढाई रुपये के स्टांप पेपर पर एक समझौता हुआ था। इसमें 13.37 एकड़ जमीन श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की बताई गई, जिसमें से करीब ढाई एकड़ शाही मस्जिद कमेटी को समझौते के आधार पर दी गई। कोर्ट में इसी समझौते को हिंदू पक्ष ने चुनौती दी है। हिंदू पक्ष का दावा है कि जन्मभूमि से संबंधित मूल संस्था श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट है। ट्रस्ट की ओर से श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ की स्थापना सिर्फ देखरेख के लिए बनाई गई थी। जमीन या अन्य किसी भी प्रशासनिक मामले में कोई अधिकार नहीं होने के बाद भी सेवा संघ ने समझौता किया, जो कि फर्जी है। कोर्ट इसे रद्द कर जन्मभूमि की जमीन को वापस दिलाए।
आदेश का अवलोकन कर जाएंगे सुप्रीम कोर्टः ईदगाह कमेटी
शाही जामा मस्जिद ईदगाह कमेटी के सचिव एवं पक्षकार अधिवक्ता तनवीर अहमद ने बृहस्पतिवार को हाईकोर्ट से आए फैसले पर कहा कि वह आदेश की प्रति मिलने पर उसका गहनता से अवलोकन करेंगे। इस आदेश के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल करेंगे। उन्होंने कहा कि एक लंबी प्रक्रिया के बाद कोर्ट ने अब तय किया है कि वाद पोषणीय है। ईदगाह कमेटी ने वादों की पोषणीयता पर ही सवाल खड़ा किया था। इसके समर्थन में तमाम साक्ष्य भी कोर्ट में पेश किए गए थे। काफी समय कोर्ट में उस पर दोनों पक्षों में बहस भी चली थी।