बाह(आगरा)। सर्दी बढ़ने के साथ ही बर्फबारी से बचने एवं भोजन की तलाश में चंबल सेंक्चुअरी की बाह रेंज में आने वाले मेहमान पक्षियों की संख्या बढ़ रही है। रुडी शेल्डक, पेंटेड स्टॉर्क, रिवर टर्न, रिवर लैपविंग, बार हेडेड गूज, रोजी पेलिकन के बाद अमेरिका, यूरोप से शॉवलर ने दस्तक दी है। इन बतखाें का रूप-रंग ही नहीं, जलक्रीड़ा भी यहां आने वाले सैलानियों का मन मोह लेती है।
शॉवलर की चोंच बड़ी एवं फावड़े जैसे आकार की होती है। जिसका उपयोग पानी से छोटे जीव जंतुओं को छानकर खाने में करते हैं। ये बतखें पानी में अपनी चोंच छलनी की तरह पटक कर शिकार पकड़ती हैं। शिकार के साथ पानी को चीर कर इनकी उड़ान का अंदाज रोमांचित कर देता है। नदी के छोटे जलीय जीव और मछलियां इनका भोजन होती हैं। इनका वैज्ञानिक नाम स्पैटुला क्लाइपीटा एवं स्थानीय नाम फावड़ा बतख है। बाह के रेंजर कुलदीप सहाय पंकज ने बताया कि प्रवासी पक्षियों की आमद से राजस्थान के बॉर्डर रेहा से लेकर इटावा के बॉर्डर उदयपुर खुर्द तक चंबल की वादियां गुलजार हैं। सर्दी में बर्फबारी से बचने एवं भोजन की तलाश में प्रवासी पक्षी हर साल चंबल का रुख करते हैं। मोटर बोट से पेट्रोलिंग कर मेहमान पक्षियों के विचरण पर निगरानी रखी जा रही है।
ऐसे पहचानें नर और मादा शॉवलर
नर शॉवलर की गर्दन चमकदार हरी, छाती सफेद होती है, पेट पर भूरे, नारंगी धब्बे होते हैं। लंबी काली चोंच और आंख पीली होती है। जबकि मादा शॉवलर का रंग पूरी तरह से भूरा होता है। इनकी छोटी नीली गर्दन होती है। लंबी बड़ी नारंगी चोंच एवं पैरों का रंग नारंगी होता है। शॉवलर की लंबाई 50 सेमी, वजन 600 ग्राम, पंख फैलाव 76 सेमी होता है।
ऐसे पहुंचे चंबल- जिला मुख्यालय आगरा से 85 किमी की दूरी पर, इटावा से 40 किमी की दूरी पर, शिकोहाबाद से 45 किमी की दूरी पर नंदगवा का इंटर प्रिटेशन सेंटर है। आगरा, इटावा, शिकोहाबाद तक ट्रेन से पहुंचने के बाद बस या टैक्सी से सैलानी ईको टूरिज्म सेंटर नंदगवा तक पहुंच सकते हैं। चंबल भ्रमण के लिए विदेशी सैलानी को 600 रुपये तथा स्थानीय सैलानी को 50 रुपये का शुल्क अदा करना पड़ेगा।