एडीए के अफसरों के कारण हमारी दीवाली काली होने वाली है, पर हम इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से ही न्याय मांगेंगे और एडीए की करतूत को कोर्ट के सामने रखेंगे, जिसके कारण यह पूरा मामला और 1996 की तरह से असमंजस की स्थिति बनी है। इस दौरान ताहिरउद्दीन ताहिर, आरिफ तैमूरी, अमित शिवहरे, संदीप अरोड़ा, अशोक बंसल, सुनीता सारस्वत, हैदर खान, विकास कोहली, सारिक अनीस, राजेश अग्रवाल, राजेश सोनकर, ब्रजेश गुप्ता समेत बड़ी संख्या में स्थानीय निवासी व कारोबारी मौजूद रहे।
सत्ताधारी नहीं दे रहे साथ, संकट में छोड़ा अकेला
ताजगंज वेलफेयर फाउंडेशन की अध्यक्ष अधिवक्ता शालिनी शर्मा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या की गई है। 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने केवल अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए थे, पर तब भी एडीए गलत व्याख्या कर रहा था। इस बार भी एडीए के अधिकारी पश्चिमी गेट की जगह पूरे ताजगंज को शामिल कर रहे हैं। कोर्ट की मंशा कभी भी लोगों को उजाड़ने की नहीं रही है।
जब पश्चिमी गेट के फड़, ठेल संचालकों को दुकानें दी गई तो 500 साल से यहां रह रहे लोगों को कैसे उजाड़ा जा सकता है। कोर्ट में एडीए के खिलाफ अवमानना की याचिका भी दायर की जा रही है। ताजगंज निवासी रिजवान ने कहा कि सत्ताधारी पार्टी के विधायक, सांसद हमें संकट केसमय अकेला छोड़ गए हैं। कोई सत्ताधारी हमारे साथ नहीं है, जबकि सत्ताधारी पार्टी कोई भी अच्छा अधिवक्ता हमारे साथ खड़ा कर सकती थी।