बच्चों की भूख मां को विचलित कर देती, पिता भी चैन नहीं पाता। जतन यही कि उनके ‘लाल’ को कोई कष्ट न पहुंचे। फैजाबाद की अयोध्या देई इकलौती नहीं, यहां भी सैकड़ों बुजुर्ग मां-बाप का दर्द बहुत कुछ उनके जैसा ही है। रोटी तो कहीं अपनेपन की भूख। पेट भरने को रोटी भले मिलती है पर साथ मेें गालियां भी। बूढ़ी आंखों ने बार अपने ऊपर वे हाथ उठते भी देखें हैं जिन्हें पकड़कर कभी उन्होंने चलना सिखाया था। पेट तो भर जाता, लेकिन हर रोटी पर जलालत की जिंदगी लिख दी। हद हुई तो अपनों को छोड़ रामलाल आश्रम में आकर बाकी के बचे दिन गुजारने लगे।
गौरतलब है कि सोमवार को फैजाबाद की अयोध्या देई ने इसलिए आत्मदाह कर लिया था क्योंकि उनके चार बेटे इस बात पर लड़ रहे थे कि उन्हें खाना कौन भेजे और वह तीन दिन से भूखी थीं। पांचवां बेटा मानसिक रूप से विकलांग है। कुछ ऐसे ही बुजुर्ग अपने शहर में भी हैं-
चार संतान मेरी, हम किसी के नहीं
रोटी लेकर पीछे भागती, खिलाकर ही अन्न हाथ लगाती। घर आते ही पहले उनका एक ही सवाल, मुन्ने ने खाना खाया कि नहीं। इतना कहते ही लंबी सांस और टप-टप गिरते आंसू। पल्लू से पोंछे और बोली कि हमारे लिए दो पहर की रोटी भी नहीं। इसके बाद लखनऊ निवासी कुसुमलता (75) के मुख से शब्द नहीं फूटे। पर उनकी बेबस आंखें ही जुबां बन गईं। बात आगे बढ़ाते हुए गोपालदास मित्तल (78) बोले, गाली तो कभी हाथ उठाने में भी बहू-बेटे के हाथ नहीं कांपे। बोले स्टेशनरी का बड़ा कारोबार था, बेटों ने बांट लिया, घर भी नाम करा लिए। इतना कहते ही उनकी आंखों से आंसू झांकने लगे बोले, तीन बेटे और एक बेटी है, लेकिन हम किसी के नहीं।
धन-दौलत के साथ मां-बाप का भी बंटवारा
एक बेटा फ्रांस में वैज्ञानिक तो दूसरा अमेरिका में साफ्टवेयर इंजीनियर, बाकी कारोबारी। उम्र होते ही समान बंटवारा कर दिया। बारी हम-दोनों को साथ रखने की आई तो बेटों ने हमें भी बांट दिया। बुलंदशहर निवासी प्रहलाद स्वरूप बंसल (65) बोले, पांच बेटों पर लिए चार-चार रोटी पैदा नहीं हुई। कभी पूरा दिन चाय पर ही गुजर जाता। खाना मांगते तो सुनने को मिलता कौन सी कमाई कर रहे हो, जो अभी से भूख लग आई। कहते ही आंखें भर आईं। बोले, तुमने (संवाददाता से) बात छेड़ी है, इसलिए वरना सब भुला दिया था। बोले, पत्नी से भी बुरा बर्ताव, कोठी उसके नाम है। इसलिए उस पर ‘प्यार’ बना हुआ है। मेरी तरफदारी करती तो उस पर बेटा-बहू आंखें तरेरते। थोड़ी सी जमा पूंजी बची, पेट भरता रहा। खत्म होते ही भूख मिटाने के भी लाले पड़ गए।
बेटा पीटता, बहू गालियां देती
बहू-बेटे, नाती-पोते परिवार में सब कोई है, लेकिन किसी के पास मां के लिए रोटी नहीं है। ये शब्द थे कमला नगर की लक्ष्मी देवी के। वो बोलीं, बेटा पीटता को बहुओं से भी कड़े शब्द सुनने को मिलते। छोटा बेटा पीटता तो बड़े बचाने भी नहीं आते। एक बार तो पैर ही तोड़ दिया। कई बार भूखी-प्यासी रही। कुछ ऐसा ही दर्द महिंदर कौर और शांति देवी का भी है। बोलती हैं कि पेट की भूख तो बर्दाश्त कर लेते, लेकिन अपमान और जिल्लत की जिंदगी बर्दाश्त से बाहर हो गई।