चार दशक पहले सावन का उल्लास अनूठा था। बाग-बगीचों में सहेलियां इकट्ठा हो जाया करती थीं, गीत-मल्हार गूंजते थे, हंसी-ठिठोली होती थी। मुझे याद है कि तालाब पर भुजरियां विसर्जन के मेले में नाच-गाने की महफिल सजती थी। सहेलियों के संग श्रृंगार कर घर से निकलती थी। शादी के बाद सहेलियों से मिलन की चाहत मायके खींच लाती थी।