निस्वां कांफ्रेंस में शरीयत में बदलाव का विरोध किया
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तीन तलाक के मुद्दे पर तंजीम उलमा ए अहले सुन्नत की ओर से नगला मेवाती स्थित मदरसे में शरीयत बचाओ निस्वां कांफ्रेंस में महिलाओं ने शरीयत के नियमों में किसी तरह की खामी से इनकार किया। कई नियमों का हवाला देकर कहा कि इस्लाम में जो अधिकार महिलाओं को सदियों पहले मिले थे, कई समाजों में आज तक हासिल नहीं हैं।
अध्यक्षता करते हुए शहनाज बेगम ने कहा कि कुरान में एक मर्द को एक साथ चार औरतों से शादी करने की इजाजत दी गई है वो वक्त और हालात के तहत कई शर्तों की पाबंदी के साथ है, जो शख्स शर्त पूरी नहीं कर सके उसके लिए एक से ज्यादा निकाह की इजाजत नहीं है। लोगों को इस्लामी कानूनों के बारे में जानकारी कम है।
फरहीन खान ने कहा कि मोदी को मुस्लिमों के धार्मिक मामलों में दखलंदाजी से बाज आना चाहिए। मुस्लिम औरतें भी अपने हक के बारे में बखूबी जानती हैं। डा. हिना सिद्दीकी ने कहा कि इस्लाम ही वो मजहब है, जिसने हम औरतों के हुकूक महफूज कर दिए और लड़कियों को जिंदा दफन करने की रस्म को खत्म कर दिया। पूर्व पार्षद मलका बेगम, शाहीन खान, निदा फातिमा ने फस्खे निकाह का उदाहरण दिया, जिसमें महिलाओं को शौहर के निकाह से आजाद होने का अधिकार प्राप्त है। हसीना बेगम, परवीन बेगम, शबाना बेगम, महरुन्निसा, नसीम बानो, शकीला बेगम, खैरून बेगम आदि मौजूद रहीं। संस्था के सचिव मोहम्मद मुदस्सिर खान कादरी ने धन्यवाद दिया।
तीन तलाक: महिलाएं ही दोषी क्यों
जिला ग्राम्य विकास अभिकरण के सहायक संख्याधिकारी एमए खान का मानना है कि कुरान में भी लिखा है कि जब इंसान यह (तलाक) अल्फाज बोलता है तो अर्श भी हिल जाता है। इस्लाम में ये भी है कि मर्द को सोचने समझने की क्षमता औरत से ज्यादा होती है। इसका मतलब यह नहीं है कि मर्द मनमानी करे। शरीयत में ये भी है कि अगर आपकी बीवी से अनबन है तो आप पहले एक तलाक दो और तीन माह तक दूर रहो। अगर तीन माह में सुलह हो जाए तो ठीक, नहीं हो तो दूसरी दफा तलाक दो और फिर दूर हो जाओ। इसके बाद भी सुलह नहीं होती है तब उन्हें बुलाओ जोकि निकाह के वक्त मौजूद थे। दोनों पक्षों की बात उनके सामने रखने के बाद तीसरी बार तलाक दो।