आगरा के थाना सिकंदरा पुलिस की हिरासत में वर्ष 2018 में पिटाई से राजू गुप्ता की मौत हो गई। न्याय की आस में राजू की मां की कोरोना काल में मौत हो गई। सीआईडी जांच में तत्कालीन इंस्पेक्टर, दो एसआई, चार एचसीपी सहित 17 पुलिसकर्मियों को अवैध हिरासत और गैर इरादतन हत्या का दोषी माना गया है।
आगरा के थाना सिकंदरा के गैलाना में किराए के मकान में रहने वाली रेनू गुप्ता अपने इकलौते बेटे राजू की मौत के बाद टूट गई थीं। लंबे संघर्ष के बाद उन्होंने पुलिसकर्मियों के खिलाफ केस तो दर्ज करवा दिया मगर पुलिस जांच-जांच खेलती रही। न्याय की आस में कोरोना काल में एकाकी जीवन जीते हुए उनकी मृत्यु हो गई।
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रेनू गुप्ता बेटे राजू के साथ रहती थीं। राजू की मौत ने उन्हें झकझोर दिया था। वह बीमार रहने लगी थीं। सिकंदरा से मकान छोड़कर जगदीशपुरा में किराए पर रहने लगी थीं। राजू के चाचा भी उन्हें साथ लेकर गए थे मगर वह अकेले रहना पसंद करती थीं। राजू के चाचा अशोक गुप्ता से जब केस में पुलिसवालों का दोष साबित होने की बात बताई गई तो उनका कहना था कि उन्हें तो न्याय तब मिलेगा जब अंशुल के साथ ही सभी पुलिसवाले जेल जाएंगे। पुलिस ने हंसता खेलता परिवार खत्म कर दिया। अब राजू और उसकी मां की आत्मा को तभी शांति मिल सकेगी जब दोषियों को सजा मिलेगी।
उन्होंने बताया कि घटना के बाद भाभी (राजू की मां) काफी दिनों तक उनके साथ रही थीं। बाद में मन नहीं लगने पर जगदीशपुरा में रहने लगी थीं। पूजा पाठ में लगी रहती थीं। आज जिंदा होती तो शायद खुश होतीं। राजू ही अपनी विधवा मां का इकलौता सहारा था।
वैश्य समाज ने छेड़ा था आंदोलन
राजू गुप्ता हत्याकांड में वैश्य समाज के नेता विनय अग्रवाल ने समाज के साथ एकजुट होकर पुलिस के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। विनय ने बताया कि वह घटना की रात ही थाने पहुंचे थे। पुलिस पोस्टमार्टम कराने को तैयार नहीं थी। दबाव बना तब कहीं जाकर पोस्टमार्टम डॉक्टर पैनल और वीडियोग्राफी के साथ कराया गया था। पुलिस ने उन्हें भी आंदोलन खत्म करने के लिए लालच दिया था। अब देर से ही सही राजू के परिवारवालों को न्याय मिल सकेगा।