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UP: कृष्ण और राधा के विवाह का साक्षी है ये मंदिर, इसलिए यहां दिया जाता है सुहागिनों को प्रसाद में सिंदूर

Wed, 01 Nov 2023 12:28 PM IST
धीरेन्द्र सिंह राहुल दक्ष, मथुरा

सार

श्रीकृष्ण ने राधारानी को अर्धांगिनी बनाया और मांग में सिंदूर भी भरा था। बताया जाता है कि ब्रह्माजी ने पिता और पंडित की भूमिका निभाई थी। 
 
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भांडीरवन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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श्रीकृष्ण और राधा यह बेशक दो नाम हैं। मगर, एक शरीर, एक जान। कहा जाता है कि राधा जी, श्रीकृष्ण की प्रेयसी हैं। कृष्ण ने उनसे शादी नहीं की। मगर, मथुरा के मांट क्षेत्र में स्थित भांडीरवन में राधा-कृष्ण के प्रगाढ़ प्रेम के अध्याय का हर आखर साक्षात हो उठता है। यह वन गवाही देता है कि राधा जी की मांग में सिंदूर भर श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाया था। ब्रह्माजी ने विवाह में पंडित और राधा जी के पिता की भूमिका अदा की थी। यही कारण हैं गौड़ीय मत से दीक्षित श्रीमती राधा कहते हैं।
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मथुरा शहर से करीब तीस किलोमीटर दूर मांट के गांव छांहरी के पास यमुना किनारे बसा भांडीरवन के मंदिर में श्री जी और श्याम की अनूप जोड़ी है। जिसमें कृष्ण का दाहिना हाथ अपनी प्रियतमा राधा की मांग भरने का भाव प्रदर्शित कर रहा है। मंदिर के सामने प्राचीन वट वृक्ष है। जनश्रुति है कि इसी वृक्ष के नीचे राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था। वट वृक्ष के नीचे बने मंदिर में राधा-कृष्ण और ब्रह्मा जी विराजमान हैं।

भांडीरवन में राधा-माधव एक दूसरे को वरमाला पहना रहे हैं। आज भी वह वृक्ष मौजूद है। यहां राधा-श्रीकृष्ण के विवाह का मंडप भी मौजूद है। इस मंदिर में राधा जी सोलह श्रृंगार अर्पित किए जाते हैं। सुहागिनों को यहां प्रसाद के तौर पर सिंदूर दिया जाता है। करवाचौथ पर यहां सिंदूर लेने के लिए भारी संख्या में आसपास की महिलाएं पहुंचती हैं। कहा जाता है कि प्रसाद में मिले सिंदूर को मांग में भरने से पति की लंबी आयु होती है।


 
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श्रीकृष्ण-राधा के विवाह का नारद जी ने किया प्रचार
मंदिर के पांचवी पीढ़ी के सेवायत सुरेश चंद दीक्षित बताते हैं कि पुराणों में वर्णन है कि एक दिन नंदबाबा बालक कृष्ण को गोद में लिए भांडीरवन से गुजर रहे थे। उसी समय श्रीकृष्ण ने बहुत तेज तूफान ला दिया।  नंद बाबा डरकर कृष्ण को गोद में लिए पेड़ के नीचे खड़े हो गए। उसी समय वहां राधा जी, वनदेवी बनकर आ गईं। गर्गाचार्य द्वारा बताए अनुसार नंद बाबा कृष्ण और राधा के देव अवतार होने की बात जानते थे। वह देवी राधा को देखकर स्तुति करने लगे और बालरूपी कृष्ण को राधा के हाथों में सौंपकर वहां से चले गए। नंद बाबा के जाने के बाद भगवान कृष्ण ने दिव्य रूप धारण कर लिया। उनकी इच्छा पर ब्रह्माजी आ गए और भांडीर वन में देवी राधा और भगवान कृष्ण का विवाह करवाया।
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