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पीएम पिघले पर प्रशासन नहीं

Fri, 09 Sep 2016 11:57 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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मस्क्युलर एट्रॉफी नामक बीमारी से ग्रसित है कुलदीप - फोटो : अमर उजाला
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खेलने-कूदने की उम्र में एक-एक कर निष्क्रिय होतीं शरीर की मांसपेशियां। जो पिता कभी उसके पीछे भागा करता था, अब वही उसे अपनी गोद में लिए दर-दर घूम रहा है। सिर्फ इस कोशिश में, पैरों की तरह से कहीं मासूम बच्चे की पूरी जिंदगी उसका साथ न छोड़ दे। बच्चे की दशा और पिता की व्यथा ने प्रधानमंत्री का दिल तो पिघला दिया लेकिन कठोर हो चुकी प्रशासनिक मशीनरी का दिल नहीं पसीजा। बेटे को बचाने के लिए लाचार पिता पिछले एक महीने से कलेक्ट्र्रेट के चक्कर काट रहा है।
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किरावली तहसील के अर्रूआखास गांव निवासी उम्मेद सिंह का नौ वर्षीय बेटा कुलदीप मस्क्युलर एट्रॉफी नामक गंभीर बीमारी से ग्रसित है। उसकी मांसपेशियां धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं। उसे यह बीमारी बचपन से थी लेकिन अब अंतिम पड़ाव पर है। उसकी बोनमेरो ट्रांसप्लांट होना है।

आगरा ही नहीं, नोएडा-दिल्ली में डॉक्टरों को दिखा चुका है। सभी ने उसके इलाज पर लगभग 10 लाख रुपये का खर्च बताया। मेहनत-मजदूरी कर परिवार का भरन-पोषण करने वाले उम्मेद के लिए इतनी धनराशि जुटाना नामुमकिन है। उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और जिला प्रशासनिक अधिकारियों से बच्चे के इलाज के लिए धनराशि उपलब्ध कराने की गुहार लगाई। 
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प्रधानमंत्री कार्यालय तो सक्रिय हो गया लेकिन जिला प्रशासन ने एक मजबूर पिता की गुहार को फाइलों में दबा दिया। इधर, थोड़ी-बहुत खानापूर्ति के बाद प्रधानमंत्री राहत कोष से बच्चे के इलाज के लिए तीन लाख रुपये भी जारी हो गए। इससे उम्मेद ने नोएडा स्थित अस्पताल में 10 अगस्त को पहला बोनमेरो ट्रांसप्लांट कराया। चिकित्सकों ने दो और बोनमेरो ट्रांसप्लांट का सुझाव दिया है। इस पर छह लाख रुपये खर्च आएगा। बेबस पिता ने एक बार फिर से प्रशासनिक अधिकारियों से गुहार लगाई। 

प्रधानमंत्री राहत कोष से धनराशि स्वीकृत होने की जानकारी के बाद प्रशासन ने उम्मेद की फाइल से धूल हटाना शुरू किया। जिलाधिकारी के यहां से 16 अगस्त को मुख्यमंत्री के सचिव को पत्र लिखा गया, जिसमें प्रार्थी को आर्थिक सहायता दिलाने के लिए कहा गया। इसके बाद से न तो प्रशासनिक अधिकारियों ने कोई सुध ली और न ही मुख्यमंत्री कार्यालय से जवाब आया। उम्मेद का कहना है कि शुक्रवार को भी अपने बच्चे को लेकर जिलाधिकारी कार्यालय गया। यहां उसकी सुनने वाला कोई नहीं था। वह पत्नी और बच्चे के साथ पिछले एक माह से कलेक्ट्रेट के चक्कर लगा रहा है। 
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