जिन्हें अपने परिजनों की मृत्यु तिथि नहीं पता है, उनके निमित्त अथवा ज्ञात अज्ञात पितरों के निमित्त अमावस्या को श्राद्ध व तर्पण कर सकते हैं। पितृ पक्ष पितरों के लिए पर्व का समय है। इसलिए इस पक्ष में श्राद्ध किया जाना चाहिए। इनकी कृपा से ही सुख, समृद्धि बनी रहती है।
श्राद्ध में ये तीन अत्यंत पवित्र माने जाते हैं
पुत्री का पुत्र अर्थात दौहित्र, कुतप समय अर्थात दोपहर का समय व तिल। श्राद्ध कर्म में ये तीन पवित्र माने गए हैं। सामान्यतः श्राद्ध कर्म में कभी क्रोध व जल्दबाजी नही करना चाहिए। शांति, प्रसन्नता व श्रद्धा पूर्वक किया कर्म ही पितरों को प्राप्त होता है। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध कर्म हमारे वेद शास्त्रों द्वारा अनुमोदित व विज्ञान सम्मत भी है।
आचार्य पंडित रामचंद्र शर्मा वैदिक ने बताया कि कन्यागत सूर्य में जो भोज्य सामग्री पितरों को दी जाती है वे समस्त स्वर्ग प्रदान करने वाली कही गई है। पितृ पक्ष के ये सोलह दिन यज्ञों के समान है। इस काल में अपने पितरों की मृत्यु तिथि पर दिया गया। भोजनादि पदार्थ अक्षय होता है। इसलिए इस काल में श्राद्ध, तर्पण, दान, पुण्य आदि अवश्य करना चाहिए। इससे आयु, पुत्र, यश, कीर्ती, समृद्धि, बल, सुख, धन, धान्य की प्राप्ति होती है।