आगरा के 34 साल पुराने चर्चित पनवारी कांड के बाद अकोला में भड़की हिंसा के 32 दोषियों को हाईकोर्ट से राहत मिलने पर कागाराैल के गांव अकोला और ऊदर थोक में खुशी की लहर दाैड़ गई। इस मामले में सजा के खिलाफ अपील पर सुनवाई होना बाकी है। वहीं दो अपीलकर्ता राजकुमार और गोपाल की जमानत पर सुनवाई बुधवार को होगी। एक दोषी नंगा ने कोर्ट में समर्पण नहीं किया है।
सिकंदरा के गांव पनवारी में 22 जून 1990 को अनुसूचित जाति के परिवार की बेटी की बरात चढ़ने के विवाद में हिंसा भड़क गई थी। चोखेलाल जाटव की बेटी मुंद्रा की बरात आनी थी। 21 जून को जाट समाज के लोगों ने बरात चढ़ाने का विरोध किया। इस कारण बरात नहीं चढ़ सकी। दूसरे दिन पुलिस की माैजूदगी में बरात चढ़ाई जा रही थी, तभी लोगों की भीड़ ने बरात को रोका था। पुलिस ने भीड़ को रोकने के लिए बल प्रयोग किया था। फायरिंग में गोली लगने से सोनीराम जाट की माैत हो गई थी। इस मामले में सिकंदरा थाने में केस दर्ज हुआ था।
इसके बाद आसपास के क्षेत्र में हिंसा भड़क गई थी। 24 जून 1990 को अकोला में दोपहर एक बजे अनुसूचित जाति और जाट समाज के लोग आमने-सामने आ गए थे। एक महिला की माैत हो गई थी और 150 से अधिक घायल हो गए थे। थाना कागाराैल के तत्कालीन एसओ ओमप्रकाश राणा ने 200 से अधिक के खिलाफ केस दर्ज कराया था। दोषियों की ओर से हाईकोर्ट में पैरवी अधिवक्ता कुलदीप चाहर ने की। उन्होंने बताया कि सभी दोषी 65 की उम्र पार कर चुके थे। वहीं एससी-एसटी एक्ट की धारा 3 (1) (10) का कोई आधार नहीं था। इस कारण इस धारा में चार्ज नहीं बन रहे थे। सभी ट्रायल के दाैरान भी जमानत पर थे। उन्होंने हाईकोर्ट में अपने तर्क दिए।