एक्सक्लूसिव: नन्हें कारसेवक पंकज और पूजा...रामकाज के लिए गए थे जेल
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राम...आस्था और भाव हैं, जिसने उन्हें जी लिया उसके लिए पुलिस-जेल के भी क्या मायने। ताजनगरी आगरा के इंद्रा कॉलोनी (अब प्रताप नगर) के पंकज और पूजा बुद्धिराजा ऐसे ही नन्हें कारसेवक रहे, जो 9 व 11 साल की उम्र में गिरफ्तार हुए। परिवार का दावा है कि रामकाज के लिए जेल जाने वाले पंकज देश के सबसे नन्हे कारसेवक रहे। इनके मां-पिता और बड़ी बहन भी आंदोलन में सक्रिय रहे। 34 साल बाद मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की खुशी में परिवार में सभी की आंखें छलक पड़ीं हैं।
बनने का जिक्र सुनकर पंकज बुद्धिराजा (43) भावुक हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि 27 अक्तूबर 1990 को अपनी बड़ी बहन पूजा और कारसेवकों के साथ अयोध्या जा रहे थे। जोगीपाड़ा के काली मंदिर के पास पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर एमडी जैन इंटर कॉलेज में बनी अस्थायी जेल में बंद कर दिया। शाम को सेंट्रल जेल भेज दिया। आधी रात पुलिस अधिकारी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को बच्चों के गिरफ्तारी की जानकारी दी।
इस पर उन्होंने अधिकारी से तुरंत छोड़ने का आदेश देते हुए कहा कि बच्चों की गिरफ्तारी से देशभर में कोहराम मच जाएगा। ये बातें पुलिस अधिकारी ने हमें भी बताईं। देर रात ही हमें छोड़ दिया गया। अगले एक-दो महीने तक मेरा और बहन का खूब स्वागत हुआ, भाषण के लिए भी लोग बुलाते थे। अभी जयपुर में नामी कोचिंग में पढ़ाने वाले पंकज बोले, 22 जनवरी मेरे जीवन का सबसे बड़ा दिन होगा। प्राण प्रतिष्ठा के बाद पूरा परिवार दर्शन करने जाएगा।
फोन पर फफक पड़ी पूजा, बोली-रोम रोम खिला
फरीदाबाद में रहने वाली पूजा (44) से फोन पर बात की गई तो राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की खुशी में वो फफकने लगीं। बोलीं...क्या बताऊं इन 34 साल में ऐसा कोई दिन नहीं बीता, जब मैंने भगवान से अयोध्या में राम मंदिर बनने की प्रार्थना नहीं की हो। मेरे और परिवार के रोम-राेम में राम हैं। 22 को घर में विशेष पूजा की है, पति को भी छुट्टी लेने के लिए कहा है।
बेटा-बेटी से पहले मां की भी गिरफ्तारी
पंकज और पूजा की मां कमलेश बुद्धिराजा (69) भी राम आंदोलन में 8 दिन जेल में रहीं। उन्होंने बताया कि वो दुर्गावाहिनी की महानगर संयोजिका थीं। 10-12 पदाधिकारियों के साथ पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और 8 दिन तक सेंट्रल जेल में रखा। मंदिर बनने की खुशी में आंसू पोंछते हुए बोली-मेरे जीते जी मंदिर बन गया, अब शांति से मेरे प्राण निकल सकेंगे।
आंदोलनकारियों के लिए बनातीं थीं भोजन के पैकेट
पंकज की सबसे बड़ी बहन डॉ. ज्योति ने बताया कि उस वक्त मेरी उम्र 15 साल थी। पंकज और पूजा आंदोलन में पूरी तरह से सक्रिय थे। मेरी ड्यूटी घर पर रहकर आंदोलनकारियों के लिए भोजन बनाना था। मैं और कुछ सहेलियां सब्जी और 20-20 पूड़ियों के पैकेट बनाकर रखतीं थीं, जिनको जेल में बंद कारसेवकों तक पहुंचाया जाता था।
पुलिसकर्मी भी बोलने लगा जय श्रीराम
पिता विजय कुमार बुद्धिराजा (77) ने बताया कि जेल में मिलने के लिए लंबी लाइन लगी थी। एक पुलिसकर्मी से मैंने कहा कि दो बच्चे गिरफ्तार हुए हैं, उनका मैं पिता हूं। ये सुनकर पुलिसकर्मी भावुक हो गया और अपनी बंदूक फेंककर जय श्रीराम के नारे लगाने लगा। इस पर अन्य पुलिसकर्मियों ने उसे समझाया।