ताजनगरी की मंडियों के स्वरूप भले ही वक्त के तकाजे से बदलते रहे हों लेकिन नए रंग-ढंग में भी व्यापार जगत में इनकी धमक आज भी देशभर में कायम है। मुगल बादशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर के दौर में अलग-अलग सामान के व्यापार के लिए बनाईं गईं अलग-अलग मंडियां आज बाजार और मोहल्लों की शक्ल ले चुकी हैं।
इनके व्यापार भी बदल गए हैं लेकिन नाम वही हैं जो दौर ए मुगलिया में रखे गए थे। हर मंडी की एक रोचक कहानी है। ‘हमारी धरोहर-आगरा कथा’ के माध्यम से इतिहास के पन्नों में दर्ज इनकी सुनहरी दास्तां से लेकर वर्तमान हालात से हम आपको रूबरू कराएंगे।
शहर की प्रमुख मंडियों में राजामंडी, लोहामंडी, हींग की मंडी, नाई की मंडी, सोंठ की मंडी, रुई की मंडी, नमक की मंडी, पीपल मंडी, शहजादी मंडी, घास मंडी, सिर की मंडी, गल्ला मंडी, गुड़ की मंडी और सिकंदरा सब्जी मंडी हैं।
इतिहासकार राजकिशोर शर्मा राजे ने बताया कि ज्यादातर मंडियां वर्ष 1556 में पानीपत की दूसरी जंग में हेमू को हराने के बाद 1558 में आगरा आए अकबर के समय की हैं। नाई की मंडी इससे पहले शेरशाह सूरी के समय बसाई गई थी। मंडियों के जो नाम रखे गए, वे आज भी वही हैं।
व्यापार का प्रमुख केंद्र था आगरा
राजकिशोर राजे ने बताया कि मुगलिया दौर में आगरा व्यापार का बड़ा केंद्र रहा। अकबर के समय में देश का ही नहीं, एशिया के प्रमुख बाजार लाहौर और आगरा थे। अकबर के वजीर ए आजम रहे अबुल फजल ने भी इसका वर्णन किया है। दरी-गलीचे, शॉल, मसाले, हाथी दांत, सूती वस्त्र, लोहे के हथियार का कारोबार होता था। आगरा और सीकरी में सिक्कों की टकसालें थीं।
मंडियां ही नहीं, गंज और हाई भी
इतिहासकार सुगम आनंद ने बताया कि व्यापार को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए अकबर के समय सिर्फ मंडियों की ही स्थापना नहीं की गई, बल्कि हाई और गंज भी बनाए गए। हाई ऐसी जगह होती थी जहां साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक बाजार लगते थे, जैसे नुनिहाई। इसी तरह गंज संभवत: वे स्थान थे, जहां सामान का भंडारण किया जाता था, जैसे ताजगंज, बेलनगंज, शाहगंज, आलमगंज, मोतीगंज।