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मथुरा: गौरैया के साथ राष्ट्रीय पक्षी मोर पर भी मंडराने लगा संकट, तेजी से घट रही है संख्या

Sun, 01 May 2022 01:23 PM IST
मुकेश कुमार वीर नारायण शर्मा, गोवर्धन (मथुरा)

सार

गिरिराज पर्वत क्षेत्र में पौराणिक धो, कीकर, पीलू आदि के पेड़ तो हैं लेकिन संरक्षण के अभाव में पेड़ों पर बने चिड़ियों के घोंसलों को बंदर तबाह कर रहे हैं। राष्ट्रीय पक्षी मोर भी बंदरों के उत्पात की भेंट चढ़ रहे हैं। 
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गिरिराज पर्वत - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मथुरा के गोवर्धन में अनदेखी से गिरिराज पर्वत की प्राकृतिक संपदा के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। पर्वतीय क्षेत्र में गौरैया के विलुप्त होने के बाद अब विचरण करते राष्ट्रीय पक्षी मोर भी ओझल होने लगे हैं। इससे पर्वत क्षेत्र सूना नजर आने लगा है।

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एक साल पहले वन विभाग द्वारा किए गए सर्वे में 21 किमी पर्वतीय परिक्रमा क्षेत्र में महज 43 मोर प्रवास कर रहे हैं। हालांकि वन विभाग अब दावा कर रहा है कि मोर की संख्या करीब 100 है। इस क्षेत्र में पौराणिक धो, कीकर, पीलू आदि के पेड़ तो हैं लेकिन संरक्षण के अभाव में पेड़ों पर बने चिड़ियों के घोंसलों को बंदर तबाह कर रहे हैं। राष्ट्रीय पक्षी मोर भी बंदरों के उत्पात की भेंट चढ़ रहे हैं।  

इस बार नहीं की गई पानी की व्यवस्था 

ग्रीष्म काल शुरू होते ही गिरिराज पर्वत क्षेत्र में वन विभाग द्वारा पक्षियों के बसेरा के लिए पेड़ों पर लकड़ी (काठ) और घास के बने घोंसला एवं पानी के लिए जगह-जगह मिट्टी की डीप धराए जाते थे। इस बार वन विभाग ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया है। 

भूख, प्यास एवं संरक्षण के अभाव में पर्वत क्षेत्र से पक्षियों की चहल-पहल थम रही है। राष्ट्रीय पक्षी मोर और गौरैया इस स्थिति से संकट में हैं। इसमें से गौरैया पूरी तरह विलुप्त होने के कगार पर हैं तो मोर की संख्या भी तेजी के साथ कम हो गई है।

समाजसेवी गौतम खंडेलवाल ने बताया कि गिरिराज पर्वत क्षेत्र पर बड़ी संख्या में बंदर प्रवास कर रहे हैं। भूख के कारण बंदर पर्वत क्षेत्र में पेड़ों पर बने पक्षियों के घोंसलों को नष्ट कर उनके अंडे खा जाते हैं। इसी तरह मोर को झपट्टा मारकर घायल कर रहे हैं। मोर के अंडों को खा जाते हैं। कभी यहां पर सैकड़ों की संख्या में मोर हुए करते थे। गौरैया, मोर व अन्य पशु पक्षियों को संरक्षित करने की जरूरत है। यह तभी हो सकता है जब क्षेत्र में मंकी सफारी बने।

ध्वनि प्रदूषण से भी घटी संख्या 

संत दीन बंधु शास्त्री ने कहा कि गिरिराज पर्वत पहले वन क्षेत्र था, अब क्षेत्र में बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हो गईं हैं। ध्वनि प्रदूषण बढ़ने से मोर गिरिराज तलहटी से विलुप्त होते जा रहे हैं। अब इन इलाकों में मोर इक्का-दुक्का ही दिखाई दे रहे हैं। उनके संरक्षण पर वन विभाग को ध्यान देना चाहिए।
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जतीपुरा के ओम प्रकाश शर्मा ने कहा कि मोर भगवान कृष्ण को बेहद प्रिय थे, भगवान कृष्ण ने स्वयं मोर पंख को अपने शीश पर मुकुट में धारण किया था। गिरिराज पर्वत पर पंख फैलाकर विचरण करते मोर श्रद्धालुओं को द्वापर युग का एहसास कराते हैं। इस समय पर्वत क्षेत्र में मोर देखना तो दूर कुकयाने की आवाज भी सुनाई नहीं देती है।

वन क्षेत्राधिकारी गोवर्धन मनोज कुमार ने कहा कि गिरिराज पर्वत क्षेत्र में एक सैकड़ा के आसपास राष्ट्रीय पक्षी मोर विचरण कर रहे हैं। राजस्थान क्षेत्र से जुड़े एरिया में बंदर हैं लेकिन मोर आदि के शिकार करने की जानकारी नहीं है। फव्वारों से पर्वत क्षेत्र में पानी की व्यवस्था की जा रही है।
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