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डॉक्टर्स डे: कोरोना काल में दूसरों की जान बचाने में जुटे ऐसे योद्धाओं को सलाम, अपनों को खोने के बाद भी नहीं छोड़ा हौसला

Thu, 01 Jul 2021 09:06 AM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
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डॉक्टर्स डे 2021: डॉ. गरिमा, डॉ. जीवी - फोटो : अमर उजाला
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सफेद कोट पहने और गले में आला डाले डॉक्टरों को यू हीं धरती का भगवान नहीं बोला जाता। कोरोना महामारी में यह साबित भी किया। कोरोना की दूसरी लहर में 10 से अधिक डॉक्टरों की जान गई, कइयों ने अपने परिजनों को भी खोया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी और दूसरों की जान बचाने के लिए जुट रहे। इन्हीं के भरोसे से लोगों को बल मिला। लगातार ड्यूटी करने के बाद भी इनका हौसला बरकरार है। बचाव के चलते घर पर बच्चों से दूरी बरत रहे हैं।
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मां-पिता को खोया, पर निभाया फर्ज: डॉ. जीवी 
एसएन के वक्ष एवं क्षय रोग विभाग के डॉ. जीवी सिंह ने दूसरी लहर में मां और पिता को खो दिया। माता-पिता की मौत का शोक भी नहीं मना सके और कोविड वार्ड में ड्यूटी लग गई। कोविड वार्ड में ड्यूूटी करते वक्त खुद भी संक्रमित हुए। जीवी सिंह बोले, अंतिम वक्त में मां यही बोली, कि बेटे मरीजों को भाई, बहन माता-पिता मानकर इलाज करना। उनके शब्द हमेशा प्रेरित करेंगे। 

बीते साल दिसंबर से नहीं गई घर: डॉ. गरिमा 
मेडिसिन विभाग की डॉ. गरिमा कन्नौजिया ने बताया कि बीते साल दिसंबर से वह पीलीभीत अपने घर नहीं जा पाई हैं। माता, पिता, बहन-भाई और दादा-दादी चिंता करते हैं। दूसरी लहर में कोरोना चरम पर था, तब तो खाने-पीने की भी फुर्सत नहीं थी। यही मरीज अपने बन गए, इनके इलाज में दिन-रात नहीं देखा। पिताजी कहते बेटी, मानवता पर संकट है, तुम्हारी मेहनत में कोई कमी न रह जाए। 
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डॉक्टर नंदन सिंह एवं डॉ. ज्ञान प्रकाश गुप्ता, बाएं से दाएं - फोटो : अमर उजाला
इलाज में रुपये नहीं बनते हैं बाधा: डॉ. ज्ञानप्रकाश
वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. ज्ञानप्रकाश सादगी और सरल स्वभाव के साथ मरीजों में भी लोकप्रिय हैं। ओपीडी हो या फिर ऑपरेशन। कभी रुपये इलाज में बाधा नहीं बने और किसी मरीज को क्लीनिक से निराश नहीं लौटने दिया। कई मरीजों के निशुल्क ऑपरेशन कर जीवनदान दे चुके हैं। उनका कहना है कि माता-पिता से मानवता का पाठ पढ़ा। इलाज के लिए रुपयों को तवज्जो नहीं दी।

पति-पत्नी संक्रमित, घर नहीं जा पाए: डॉ. नंदन 
स्वास्थ्य विभाग के डिप्टी सीएमओ डॉ. नंदन सिंह डेढ़ साल से रैपिड रिस्पांस टीम के प्रभारी हैं। इन्होंने बताया कि सूची मिलते ही दिन-रात देखे बिना संक्रमित मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराना, कांटेक्ट वालों की सूची कर उनको खोजकर नमूने दिलवाने का कार्य रहा। दूसरी लहर में काम इतना बढ़ गया कि कोसी में पत्नी और बेटा संक्रमित हो गए, लेकिन घर नहीं जा सका। 

डॉक्टर विवेक एवं डॉ. अखिल, बाएं से दाएं - फोटो : अमर उजाला
संक्रमितों के ऑपरेशन भी किए: डॉ. विवेक 
एसएन के सर्जरी विभाग के डॉ. विवेक कुमार ने पहली लहर में चार कोविड वार्ड में ड्यूटी निभाई। दूसरी लहर में संक्रमित मरीजों के ऑपरेशन का जिम्मा मिला। चिकित्सकों की टीम के साथ कोविड अस्पताल में ही संक्रमित मरीजों के ऑपरेशन किए। इसके बाद फॉलोअप में भी उनको देखने जाते। बताया कि फरवरी में बच्ची ने जन्म लिया, संक्रमण के चलते उसे दुलार भी नहीं पाता था।

इलाज में ही गुजर जाते 12-14 घंटे: डॉ. अखिल 
मई में कोरोना की दूसरी लहर हल्की पड़ी तो ब्लैक फंगस के मरीज आने लगे। ऐसे में एसएन के ईएनटी रोग विभाग के डॉ. अखिल प्रताप सिंह ने फिर चुनौतियों को स्वीकारा। मरीजों के ऑपरेशन और इलाज में ही 12-14 घंटे होने लगे। डॉ. अखिल ने बताया कि अप्रैल में कोविड वार्ड में दिन-रात देखे बिना मरीजों के इलाज में जुटे रहे। कभी-कभी बच्चों और पत्नी से बात नहीं हो पाती है।
 

डॉ सुनील शर्मा - फोटो : अमर उजाला
परिजन बनकर करते चिकित्सकीय सेवा: डॉ. सुनील 
लेप्रोस्कॉपिक सर्जन डॉ. सुनील शर्मा असहायों की सेवा के लिए हमेशा आगे रहते हैं। रामलाल वृद्धाश्रम के बुजुर्ग या फिर लावारिस हाल में मिलने वाले मरीजों के इलाज और ऑपरेशन की जरूरत पड़ी तो वह परिजन की भूमिका में नजर आए और निशुल्क इलाज किया। वह बताते हैं कि माता-पिता से प्रेरणा मिली, उनका यही कहना  था कि रुपयों के अभाव में किसी का इलाज नहीं रुकना चाहिए। 
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डॉक्टर दंपती - फोटो : अमर उजाला
पति-पत्नी ने कोविड वार्ड में संभाला मोर्चा 
एसएन के एनेस्थीसिया विभाग के ऑक्सीजन प्रभारी डॉ. अपूर्व मित्तल ने कोविड आईसीयू में भी ड्यूटी दी। इनकी पत्नी डॉ. अर्पिता सक्सेना ने दूसरी कोविड आईसीयू में मरीजों के इलाज का जिम्मा संभाला। आठ साल की बच्ची और चार साल का बेटा है। बेटा गंभीर बीमारी से जूूझ रहा है, उसका जिम्मा दादी ने संभाला। दोनों बोले, कोविड में मरीजों का इलाज किया, शायद उन्हीं की किसी प्रार्थना से बेटा पूरी तरह से ठीक हो जाए। 

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