आगरा। नगर निगम में भ्रष्टाचार के खेल निराले हैं। जिस भूमि पर कलेक्टर का मालिकाना हक था, जो राजस्व रिकॉर्ड में सार्वजनिक सड़क और रास्ते के रूप में दर्ज है, उसे ही निगम ने पट्टे पर उठा दिया। 79 साल तक राजा मंडी बाजार स्थित लाभचंद्र मार्केट में यह खेल चलता रहा।
शर्तों के उल्लंघन के बीच 17 साल तक फाइल झूलती रही, लेकिन कार्रवाई नहीं की गई। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में जब उच्च अधिकारियों की गर्दन फंसी तो बचने के लिए 48 घंटे में पट्टा निरस्त कर दिया गया।
लाभचंद्र मार्केट की भूमि के पट्टा आवंटन से लेकर नवीनीकरण तक में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। एक तरफ पट्टाधारक और उनके वारिसों ने 15 रुपये सालाना किराए पर मिली पट्टे की भूमि पर होटल और मार्केट खड़े कर करोड़ों रुपये की संपत्तियां अर्जित कीं। वहीं, दूसरी तरफ पट्टा आवंटन के समय नगर निगम और प्रशासनिक अधिकारियों ने सड़क का तथ्य छिपाया।
ऐसे में नगर निगम और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ दोनों कार्यालयों के नजूल व संपत्ति से जुड़े कर्मचारियों पर भी मिलीभगत के आरोप लग रहे हैं। किराएदारी के विवाद के बाद पट्टा आवंटन और नवीनीकरण में हुए भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ हुआ है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामा में अब डीएम अरविंद बंगारी ने पट्टे पर दी गई सरकारी बताया है। इस भूमि को अधिकारियों ने फ्री होल्ड भी कर दिया।
ताक पर रख दिए सब नियम
- राजा मंडी बाजार स्थित गाटा संख्या 264 और 287 में सड़क का राज 17 साल पहले खुला था। जिलाधिकारी कार्यालय स्थित नजूल विभाग ने 2008 में जांच कराई थी। जांच में भूमि खतौनी में सड़क पुख्ता और रास्ता के नाम दर्ज मिली थी। इस भूमि के मालिक साहब कलेक्टर बहादुर यानी सरकार है। नियमों के मुताबिक, सार्वजनिक रास्ते या सड़क की भूमि का पट्टा कभी किया ही नहीं जा सकता। इसके बावजूद नगर निगम और कलेक्ट्रेट के भ्रष्ट तंत्र ने न केवल नियमों के विरुद्ध पट्टा आवंटित किया, बल्कि नवीनीकरण भी कर दिया। वहां दुकान व अन्य अवैध निर्माण की भी मूक सहमति दे दी।
16 साल तक मौन रहे जिम्मेदार
हैरानी की बात यह है कि इस मामले में नजूल मुहर्रिर की जांच रिपोर्ट 26 अगस्त 2008 को ही आ गई थी, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि लाभचंद्र मार्केट में हुआ निर्माण अतिक्रमण की श्रेणी में आता है। इसके बावजूद, 2008 से लेकर अब तक यानी 17 वर्षों तक फाइल नगर निगम और कलेक्ट्रेट में पटलों पर धूल फांकती रही। इस लंबी चुप्पी ने नगर निगम और कलेक्ट्रेट के उन अधिकारियों और कर्मचारियों को कठघरे में खड़ा कर दिया है, जिन्होंने अवैध कब्जे को संरक्षण दिया।
अतिक्रमण हटाना निगम का दायित्व
- सार्वजनिक प्रयोजन की भूमि का पट्टा निर्गत नहीं हो सकता। उस समय कैसे सड़क और रास्ते की भूमि पर निर्माण और अतिक्रमण हुए। जांच हो रही है। अतिक्रमण हटाना नगर निगम का दायित्व है। — अरविंद बंगारी, जिलाधिकारी