उस वक्त सिक्के मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय के नाम पर ही जारी किए गए। सिक्कों पर भी फारसी में मथुरा टकसाल के नाम पर ‘इस्लामाबाद’ और वृंदावन टकसाल के नाम पर ‘मोमिनाबाद’ ही अंकित किया जाता रहा। इस दौर के कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और मथुरा-वृदावन की टकसालों में ढले वह दुर्लभ सिक्के वृंदावन के मंदिर गोदा विहार स्थित ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के संग्रह में आज भी देखे जा सकते हैं, जो औरंगजेब के दमनकारी नीति की कहानी कह रहे हैं।
औरंगजेब नामा में नाम बदलने का प्रमाण
ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के प्रकाशन अधिकारी गोपाल शरण शर्मा ने बताया कि ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के ग्रंथागार में संगृहीत ग्रंथ मुआसिर आलमगीरी जिसका लेखक मोहम्मद साकी मुस्तइदखां बादशाह औरंगजेब का दरबारी इतिहासकार था। उसने अपने इस इतिहास ग्रंथ में औरंगजेब द्वारा केशवदेव मंदिर को तोड़कर उस के स्थान पर मस्जिद का निर्माण करने तथा मथुरा और वृंदावन के नाम बदलने का प्रमाणिक विवरण दिया है। झ्स फारसी ग्रंथ का 1909 ई. में हिंदी अनुवाद मुंशी देवीप्रसाद ने ‘औरंगजेब नामा’ के नाम से किया था।